दलित विमर्शकार दिलीप मंड़ल अपनी जातिवादी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। खासकर ब्राह्मण उनके निशाने पर रहते हैं। लेकिन अब उनके निशाने पर राजपूत भी आ गए हैं। पढ़िए उनकी नयी जातिवादी टिप्पणी –
राणा प्रताप के बाद कोई राजपूत केंद्रीय राजसत्ता से नहीं लड़ा. इसलिए मैं राणा प्रताप का दिल से सम्मान करता हूं. बाकी बाद वाले सब फर्जी हैं.
राजपूतों के पिछले 500 साल समझौतापरस्ती के साल हैं. कोई गौरवगाथा नहीं है.
‘जो जीता वो सिकंदर’ फिल्म की साइकिल रेस में अगर राजपूत कॉलेज की जीत का किस्सा निकाल दें, तो राजपूतों के पास गर्व करने लायक कुछ भी नहीं है. 
खुद राणा प्रताप का बेटा मुगलों का जमींदार बन गया था. उसके बाद, जैसा कि होता है, सब लोग सुख से जीने लगे.
राजपूतों की हार की हमेशा एक दैवी वजह होती थी.
राजा की आंख में तीर लग गया, वरना जीत जाते. हाथी उल्टा दौड़ पड़ा, वरना जीत जाते. घोड़ा बिदक गया, वरना जीत जाते. हवा उल्टी बह गई, वरना जीत जाते. नदी में पानी घट गया और दुश्मन इस पार आ गया, इसलिए हार गए. खाना घट गया, इसलिए हार गए. जीतने का मन ही नहीं था, इसलिए हार गए.
पद्मावत मामले में आप जस्टिस दीपक मिश्रा की बैंच के सामने कैसे हार गए ठाकुर साहेब?
आपका ईश्वर आपका साथ क्यों नहीं देता?