बाबू लंगट सिंह स्मृति समारोह
बाबू लंगट सिंह स्मृति समारोह

नई दिल्ली। महान शिक्षाविद् बाबू लंगट सिंह को उनके समाजसेवी और दूरदर्शी कार्यों के लिए याद किया जाना चाहिए, न कि जातीय पहचान के आधार पर — यही बात बाबू लंगट सिंह स्मृति समारोह में बार-बार उभरकर सामने आई। वक्ताओं ने कहा कि लंगट बाबू अपने समय से कहीं आगे सोचने वाले व्यक्ति थे, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में वह कार्य किया जो सरकारें भी वर्षों बाद नहीं कर सकीं।

रविवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में आयोजित इस समारोह में वरिष्ठ पत्रकार एवं न्यूज़24 डिजिटल हेड सतीश के. सिंह ने कहा कि “बाबू लंगट सिंह ने उत्तर बिहार में शिक्षा की जो मशाल जलाई, उसका प्रतीक है — ऐतिहासिक एल.एस. कॉलेज, मुजफ्फरपुर। उन्होंने एक ऐसे समय में उच्च शिक्षा की नींव रखी जब समाज में इसका अभाव था।”

सतीश सिंह ने आगे कहा कि बाबू लंगट सिंह न केवल विजनरी थे, बल्कि एक ऐसे समाज सुधारक भी थे जिन्होंने शिक्षा को जाति, वर्ग और क्षेत्र की सीमाओं से परे रखकर देखा।

“सदियों में जन्म लेते हैं ऐसी विभूतियाँ” — डॉ. बिंदेश्वर पाठक

समारोह के मुख्य अतिथि और सुलभ इंटरनेशनल के सह-संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने कहा कि “लंगट बाबू जैसे शिक्षाविद् सदियों में एक बार जन्म लेते हैं।”
उन्होंने उनकी दूरदर्शिता की सराहना करते हुए कहा कि आज जब सरकारें शिक्षा के निजीकरण और व्यावसायीकरण में उलझी हैं, उस दौर में लंगट बाबू ने शिक्षा को समाज की सेवा का माध्यम बनाया।

डॉ. पाठक ने अपने संबोधन में सुलभ इंटरनेशनल की प्रेरणादायक यात्रा का भी उल्लेख किया और कहा कि “लंगट बाबू की तरह उन्होंने भी समाज को व्यवहारिक समाधान देने की दिशा में काम किया।”

“शिक्षा को सरकारी नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए” — प्रो. संगीत रागी

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रो. संगीत रागी ने लंगट बाबू के कार्यों को “शिक्षा की स्वायत्ता का प्रतीक” बताया। उन्होंने कहा कि “विश्वविद्यालयों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए, तभी शिक्षा अपने असली उद्देश्य को पूरा कर सकेगी।”

वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मनोज सिन्हा ने कहा कि “लंगट बाबू ने शिक्षा के क्षेत्र में समाज को बहुत कुछ दिया है, इसलिए ऐसे कार्यक्रम समाज को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।”

“नीतीश सरकार ने वायदे तो किए, पर निभाए नहीं” — समाजसेवी शिव कुमार

समारोह का माहौल तब गर्मा गया जब समाजसेवी शिव कुमार ने बिहार सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एल.एस. कॉलेज के जीर्णोद्धार का वादा किया था, लेकिन आज कॉलेज बदहाली का शिकार है। 63 प्रोफेसरों की जगह अब सिर्फ 8 बचे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि अब इस ऐतिहासिक संस्थान को पुनर्जीवित करने के लिए “लंगट बाबू की संतानों और समाज के शिक्षित वर्ग को आगे आना होगा।”

सभी वक्ताओं की एक राय — “जाति नहीं, कार्य से याद करें”

सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि बाबू लंगट सिंह को किसी जाति-विशेष से जोड़कर देखना उनके योगदान का अपमान होगा।
उन्होंने कहा कि “एल.एस. कॉलेज की स्थापना ने समाज के हर तबके को शिक्षित होने का अवसर दिया — यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।”

कार्यक्रम का संचालन व सम्मान समारोह

कार्यक्रम के उद्देश्य पर पुष्कर पुष्प ने प्रकाश डाला जबकि संचालन सूर्यभान राय ने किया।
समारोह के आयोजक ब्रजेश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर सभी वक्ताओं को ‘बाबू लंगट सिंह स्मृति चिन्ह’ भेंट किया गया।

कार्यक्रम में बाबू लंगट सिंह के पोते कुणाल सिंह, पूर्व आयकर अधिकारी अजय कुमार, कमल संदेश पत्रिका के कार्यकारी संपादक शिवशक्ति नाथ बक्शी, नवीन सिंह, रोहन राय, सुबोध मिश्रा, मनीष ठाकुर, केशव कुमार, आलोक सिंह, जयराम विप्लव, और बड़ी संख्या में पत्रकार, शिक्षाविद, छात्र एवं बुद्धिजीवी मौजूद थे।

निष्कर्ष

बाबू लंगट सिंह का जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है। उनके कार्यों को जातीय दृष्टि से नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से देखा जाना चाहिए — यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी इस महान शिक्षाविद् को।