राजीव कुमार, ब्रह्मऋषि चिंतक –

 

क्या वाकई भूमिहारों में आपसी जुड़ाव की जरूरत है या आत्मचिंतन की ?

भूमिहार समाज के पुनरुत्थान हेतु आत्मचिंतन पर बल देने को कह रहे हैं ब्रह्मऋषि चिंतक राजीव कुमार। प्रस्तुत है उनका पूरा लेख :

बीते वर्ष सोशल मीडिया पर एक मुद्दा घूम फिर कर छाया रहा और गाहे बगाहे सबने एक स्वर में यही कहने का प्रयास किया कि भूमिहार समाज में आपसी वैमनस्यता और छल प्रपंच का दौर खत्म होने का प्रयास होना चाहिए और आपसी जुड़ाव पर जोर होना चाहिए ।

परंतु मेरा अपना मानना यह है कि  भूमिहारों में शुरू से अपनत्व और एक दूसरे के प्रति सहानुभूति रही है और यह आज भी जारी है ।

अलबत्ता लोगों का नजरिया जरूर बदल गया है या यूँ कहें कि चंद रावणों द्वारा कुछ खुराफात , छल एवं प्रपंच  के द्वारा लोगों के सोंचने एवं देखने के नजरिये को जरूर बदलने का पुरजोर प्रयास किया गया है जिसमें वे रावण कुछ हद तक सफल भी रहे हैं और समाज पर राज भी कर रहे हैं ।

मैंने अपनी निजी जिन्दगी में अनेकों ऐसे क्षण देखे एवं परखे हैं  जहाँ बहुतेरे भूमिहार महामानवों के सहयोग एवं समर्पण को मैं आजीवन भुला नहीं सकता और इनका आजीवन मैं आभारी रहूंगा और सदैव वो मेरे लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे ।
उन्हीं अविष्मरणीय  यादों में एक घटना को आपके समक्ष साझा कर रहा हूँ जिसने मेरी जिंदगी में अपने समाज के उन सच्चे महामानवों के प्रति उनका कायल बनाकर रख दिया ।
बात 1993 की है जब मैं यक्ष्मा की बीमारी से ग्रस्त हो गया था और मुझे साँस लेने में गंभीर समस्या हो रही थी । उसी दरम्यान एक भूमिहार डॉक्टर जिनका नाम डॉक्टर सदन कुमार था उन्होंने मुझे मेरे घरपर आकर देखा और विधिवत इलाज शुरू किया । यहाँ यह बताना बहुत ही प्रासंगिक और अनिवार्य हो जाता है कि मैं जहाँ मुजफ्फरपुर का भूमिहार था वहीँ वो महामानव डॉक्टर साहब पटना के भूमिहार थे । हमारे बीच कोई रिश्तेदारी नहीं थी लेकिन मेरे पिताजी से उनकी मित्रता थी । उनहोने जिस प्रकार से  मेरे घर आकर प्रत्येक दिन इलाज और देखभाल किया उससे मैं उनकी इस दिव्य सोंच और अपने समाज के प्रति समर्पण देखकर मैं अभिभूत हो गया ।

सवाल यह नहीं कि उस महामानव ने मेरा उपचार मेरे घर आकर किया ।सवाल उनकी प्रतिबद्धता का था जिसने उनको मेरे करीब खींचकर लाने में महती भूमिका निभाई अन्यथा मैं तो उनके लिए एक मरीज मात्र था । परंतु उस महामानव ने अपने अंतर्मन में बैठी अपने समाज को सेवा करने की भावना के तहत बहुत ही संजीदगी से मेरा उपचार किया और मुझे उस रोग से मुक्ति दिलाई  ।

इसके अलावा बहुतेरे अवसर आये जहाँ उन्होंने एवं उन जैसे दिव्य सोंच रखने वाले अन्य भूमिहार महामानवों ने मेरे परिवार की मदद की एवं हमलोगों को आत्मविभोर कर दिया और हम आज भी उन जैसे महापुरुषों की सोंच और उनके कृत्य के लिए हृदयतल से उनका आभार व्यक्त करते हैं और उनसे पल पल प्रेरणा लेते हैं ।

इसलिए मेरा अपना शुरू से मानना है कि किसी भी समाज की दशा एवं दिशा सुधारनी हो तो सदैव अपने समाज के ऐसे महामानवों को ( Role Model ) आदर्श मानें , ना कि चोर , उचक्के , अपराधी , छल प्रपंची रावणों को क्योंकि किसी भी समाज की रीढ़ सदैव समाज के ये राम होते हैं जो निःस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करते हैं । समाज के रावण तो क्षणिक लाभ का वास्ता देकर लोगों को गुमराह करते हैं और व्यक्तिगत हित साधते हैं ।

इसलिए भूमिहार समाज में जरूरत है समाज के उन राम को चिन्हित करने की और उनका यशगान करने की ।
भूमिहार समाज में जुड़ाव की जरूरत नहीं है बल्कि आत्मचिंतन की जरूरत है क्योंकि आपसी जुड़ाव तो भूमिहार समाज में शुरू से रहा है । जरूरत है भूमिहार समाज में तोड़ाव / बिखराव को रोकने की , जो 1990 के उपरान्त से चंद अपराधिक एवं कुटिल प्रवृति के लोगों के राजनीतिक पदार्पण के पश्चात उन रावणों द्वारा अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए भूमिहार समाज में आपसी वैमनस्यता का बीज जमकर बोया गया ।