हत्याओं का सिलसिला कभी नहीं थमता. आप चार मारेंगे, वो दस मारेंगे, आप फिर बीस मारेंगे और अंतहीन सिलसिला चलता रहता है. नतीजा कुछ नहीं निकलता, सिर्फ बर्बादी होती है. लेकिन कई बार अपनी रक्षा के लिए शस्त्र उठाना पड़ता है और शास्त्रों में भी इसे सही माना गया है.
रणवीर सेना ने भी ऐसा ही कुछ किया था तो उसकी कार्रवाई पर पूरे देश के वामपंथी हाय-तौबा करने लगे. लेकिन दोहरा चरित्र ये रहा कि बथानी नरसंहार पर छाती पीटने वाले वामपंथी सेनारी नरसंहार जैसे हत्याकांड पर चुप्पी साध जाते हैं. ये एक तरह का मूक समर्थन ही होता है.
बहरहाल वापस सेनारी नरसंहार हत्याकांड पर वापस आते हैं और आपको उस हत्याकांड की भयावहता से संबंधित एक किस्सा बताते हैं. उससे आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि सेनारी के भू-किसानों की हत्या करने में माओवादियों ने कितनी क्रूरता दिखाई. दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट –
शवों को देख सेवानिवृत जज की हो गई थी मौत जहानाबाद :
दरअसल अरवल जिले के वंशी थाना क्षेत्र के सेनारी गांव निवासी व उच्च न्यायालय के सेवानिवृत निबंधक पद्म नारायण सिंह एक साथ गांव के 34 लोगों के शवों को देखते हीं बेहोश हो गए। दरअसल उन्हें इस घटना की जानकारी रात में ही लग गई थी। वे पटना से सीधे अपने पैतृक गांव सेनारी पहुंचे। गांव के उतर ठाकुरबाड़ी के समीप अधिकांश लोगों का शव पड़ा हुआ था। जबकि कुछ लोगों का शव गांव के पूरब रास्ते पर था। सेवानिवृत रजिस्टार स्व. ¨सह जैसे हीं ठाकुरबाड़ी के समीप पहुंचे और अपने बराहिल लाल बाबू सहित एक एक साथ शवों को देखा तो वे बेहोश होकर गिर पड़े। वहां मौजूद लोग उन्हें अस्पताल पहुंचाते तब तक घटना स्थल पर हीं उनकी मौत हो गई थी।



