लालू यादव की जगह लालू मिश्रा को सात साल की सजा सुनाई जाती तो क्या सवाल उठाते?
न्यायिक व्यवस्था को जातीयता के रंग में रंगने की मंशा रखने वालों पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तंज किया है. उन्होंने लालू यादव की सजा पर व्यंग्य करते हुए कहा कि चारा घोटाले में ही जगदीश शर्मा को 7 साल की सजा हुई और लालू जी को 3 साल की, लेकिन अगर लालू यादव की बजाय मिश्रा होते और उनको भी 7 साल की सजा होती तो क्या वो भी जज के इस फैसले पर सवाल उठाते?
उन्होंने कहा कि कानून की नजर में सभी एक समान हैं. इसलिए जज पर आरोप न लगाएं और सभी अपनी सजा पर प्रायश्चित करें. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लालू प्रसाद ने गरीबों के नाम पर अपने परिवार का विकास किया। जिस जनता ने उन्हें चुना, लालू ने उनके ही पैसे का दुरुपयोग किया.
बकौल गिरिराज, 90 के दशक में लालू अन्ना दुरई के बाद सबसे बड़े जननेता के रूप में उभर कर सामने आए थे. यही नहीं वे गरीब जनता के मसीहा के रूप में गरीबों की ताकत बनकर उभरे थे लेकिन उन्होंने गरीब का विकास न करके अपने परिवार का विकास किया, अपने परिवार के लिए अकूत धन बनाया.
रघुवंश प्रसाद के एक बयान को उन्होंने खारिज करते हुए कहा कि कि कानून की नज़र में जो गुनाहगार है उसे उसके किये गए जुर्म के आधार पर ही सजा सुनाई जाती है ना कि जात पात को देखकर सुनाई जाती है.
गिरिराज ने कहा कि लालू जातीय संघर्ष फैलाने की बजाय जातीय सामंजस्यता की बात करें तो राजनीति और उनके राजनैतिक जीवन के लिए मिल का पत्थर साबित होगा. (स्रोत-एजेंसी)




