महाभारत में पांडवों के हिस्से में खाण्डव वन आया जिसे वो अपने मेहनत लगन और ईमानदारी से इंद्रप्रस्थ बना देते है। और कौरवों की लार टपकने लगती है। सीधे सीधे पांडवों सेे छिना नहीं जा सकता था तो कुटिल चाल और जुए का सहारा ले पांडवो के सीधेपन का सब हथिया उन्हें वनवास दे दिया जाता है। 
वनवास खत्म होने की अवधि पे कृष्ण दुर्योधन के पास जाते हैं और……… उन्हें बस 5 गाँव दे दो, शांति हो जायेगी। 
दुर्योधन : मै उन्हें सुई के नोक के बराबर जगह भी न दूंगा, यदि उन्हें कुछ चाहिए तो युद्ध कर के लें। नतीजा जग जाहिर है। कौरवों का नामोनिशां मिट गया और इतिहास ने बताया कि जरुरत से ज्यादा उदार होना पांडवों के लिए कितना खतरनाक था। 
महाभारत का ये परिदृश्य भी आज बदला नहीं है। बटवारे के बाद दोनों देशों में एक ही परिस्थितियां थी। भारत ने मेहनत और लगन से उसे विश्व में आगे बढ़ता रहा जबकि पकिस्तान की क्या हालत है सबको मालूम है। आज भी उन कुटिलो के दाग हमारे अस्मिता और स्थानों पे लगे हुए हैं। अन्यथा क्या कारण है कि मस्जिद अयोध्या, मथुरा और काशी में ठीक बगल में ही है, जाहिर है हिन्दुओ की मानसिक रूप से कुचलने के लिए। चलो , वो आक्रमणकारी थे, और आज ?आज के मुस्लिम सच्चाई जानते हुए भी कौरवों की तरह अड़े है तो किस तरह उनकी मानसिकता आक्रमणकारी सनातन विध्वंशक से भिन्न है ? क्या ये उदार हैं? तो हम क्यों एकतरफा गंगा- अरबी की माला जपते है? क्या हमें इतिहास से सिख लेने की जरुरत नहीं है? बात जमींन के एक टुकड़े की नहीं बात हमारे अस्मिता और एक्सीस्टेन्स की है। तुम्हारे लिए वो सर्फ एक जगह है जबकि हमारे लिए एक आस्था। शर्म आनी चाहिए तुम्हे की तुम उसे आक्रमणकारी की निशानी न मानन जाने हमसे किस मुह से गंगा -अरबी तहजीब की आशा रखते हो? फिर भी  हम धैर्य और उदारता देख तुमसे गिड़गिड़ा रहे हैं। 80% कि बहुसंख्यक जनता 20% से अपनी आइडेंटिटी के लिए गिड़गिड़ा रही और तुम दुर्योधनी अहंकार में डूबे पड़े हो। मद हो मदमस्त हो। 
हिन्दू अपने भोले पन और हिन्दू-जमनी (? जमनी क्यों कहते है हमें नही पता, सबसे पहले इस टर्मिनोलॉजी को चेंज कर “अरबी” होना चाहिए) टाइप एकतरफा उदारता के कारण दशकों तक राजनैतिक वनवास काट आज वापिस लौट अपना अधिकार मांग रहा है और अब ये कुटिल चाल चलने पे आमादा है। ये कहते हैं बिना अदालत के सुई की नोक के बराबर भी कुछ न देंगे। ठीक है जी। अदालत ही देगी। और एक बार आपने रस्ते खोल दिए युद्ध के तो हम मथुरा और काशी को भी मुक्त कराएंगे। सिर्फ अयोध्या मथुरा काशी ही नहीं, हर उस जगह को मुक्त कराएँगे जो तुमने अपनी घृणित मानसिकता से बंधक बना राख्हा है, चाहे वो कोई गुरुद्वारा हो, मठ हो या जैन तीर्थ, खोज खोज के आजाद कराएंगे तुम्हारे दिए हुए ही अवसर से। जांघ भी तोड़ेंगे, और अट्टहास भिं करेंगे आजादी का। अपने आत्मसम्मान की द्रोपदी को तुम्हारे कलंकी दाग रूपी खून से नाहलायेंगे, किसी भी पताल में छुप जाओ वहाँ से ढूंढ के युद्ध करेंगे। बस हिन्दू इस बार इनके हिन्दू -अरबी के कुटिल चाल में न फसें। #kamal(लेखक के सोशल मीडिया प्रोफाइल से साभार)
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