सेनारी नरसंहार : न्याय की देवी के आँखों पर सचमुच पट्टी बंधी हुई है. माफ कीजियेगा लेकिन सेनारी नरसंहार पर जो फैसला माननीय न्यायालय का आया है, उसपर यही कहा जा सकता है.
न्यायालय ने 15 को दोषी माना और 23 को बाईज्जत बरी कर दिया. माईलॉर्ड के फैसले से हमें मायूसी नहीं, लेकिन ये यकीन नहीं होता कि 15 गीदड़ों ने 34 शेरों का घेरकर शिकार किया.
भूमिपुत्रों के नाम से जिनकी रूह काँप जाया करती है वो 15 लोगों के साथ पूरे गाँव पर हमला करेंगे और सफल भी हो जाएंगे. माईलॉर्ड यकीन नहीं होता. कम -से-कम ऐसा फैसला देने के पहले इतिहास के पन्ने तो उलट लेते.
इतिहास न सही कम – से कम जंगल का कानून तो पढ़ लेते. शेर और गीदड़ की पहचान तो कर लेते. झुंड बनाकर भी गीदड़ एक शेर पर हमला बोलने से पहले हिचकता रहता है.
इस फैसले से बेहतर होता कि सर्जिकल स्ट्राइक की तरह न्यायालय यही मान लेता कि कोई हत्या हुई ही नहीं और हुई भी है तो हत्यारा कोई है ही नहीं.
सिर्फ 23 को ही क्यों बाकी 15 को भी रिहा कर दीजिए. जंगल में शेर निपट लेगा और आप तो जानते ही हैं कि जंगल में शेर की क्या औकात होती है.



