बाबू अम्बुज शर्मा-
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| बाबू अम्बुज शर्मा |
बाबू झूलन सिंह जी पर चर्चा से पूर्व हम आपको उस दौर के तत्कालीन सामाजिक ताने बाने से परिचित कराना चाहेंगे । भारत की स्वतंत्रता के पश्चात सभी रियासतों और जमींदारों का विलय येन केन प्रकारेण भारत संघ में करवा लिया गया। इसी क्रम में वर्तमान मगध क्षेत्र के राजा टेकारी स्टेट महाराजाधिराज गोपाल शरण सिंह जी महाराज ने स्वेच्छा से १९५२ में भारत विलय की संधि पर हस्ताक्षर कर दिये। गौरबतल हो कि टिकारी भूमिहार स्टेट थी किन्तु नौ अना स्टेट का कोई वारीश न होने तथा राजा जी के व्याभिचार के कारण स्टेट लगभग नाश के करीब था ऐसे मे महाराज का ये निर्णय सही था। स्वतंत्रता बंटवारे का दंश लेकर आयी थी पूरब और पश्चिम के लिये। पूरब में बांग्लादेश तब पूर्वी पाकिस्तान था,बंगाल तत्कालीन राजनीति का अखाडा । जिन्ना ने आजादी के दो दिन पहले कलकता में ही Direct Action Day नाम से दंगे की शुरुवात करवाई थी।
बंगाल में हिन्दू आबादी कम होने के कारण भीषण मृत्यु तांडव हुआ किन्तु मगध ने भूमिहार शिरोमणी बाबू मथुरा सिंह के नेतृत्व मे मगध को इन प्रहारो से अक्षुण्ण रखा। ऐसे में वहा से पलायन कर आये हिन्दू मगध मे शरण पाये । बंगाल बिहार उडीसा पर नवाबी हूक़ूमत के कारण मुसलमा आर्थिक रूप से सुदृढ थे किन्तु लोहगढ महंथ और मथुरा बाबू सरीखे कुशल योद्धाओं के नेतृत्व में मुसलमानों के बहुसंख्य आबादी को यहाँ से खदेड दिया गया। जब यहाँ के भूमिहार योद्धा धर्म और मातृभूमि के लिए लड रहे थे बाबू साहेब लोग राजनीति मे व्यस्त थे, भाइचारा और शान्ति का स्वांग कर रहे थे क्योंकि उनकी नजर मुसलमानों के जमीन पर थी कि औने पौने दाम में या तो उन भागते भूतों से जमीन खरीद ले या फिर वो हमे अपना हितैषी मान खुद जमीन दे कर चले जाये। ऐसे में ये बहुत कम लोग जानते है कि १९४७ _४८ के दौर में बाबू साहब लोगां के शोर शराबे में आ कर नेहरू ने मगध पर ३ बार हवाई हमले कराये।
खैर इन मुद्दों पर चर्चा आगे करूंगा। १९५२ में विलय के पश्चात १९५२ में ही प्रथम विधान सभा तथा लोक सभा चुनाव हुये। महाराज दोनों चुनावों में खडे हुए और दोनो हार गये । विजनेश्वर मिसिर प्रजा सोश्लिस्ट पार्टी के उम्मीदवार वहाँ से विजय हुए ।
आगे पढें : मगध में नक्सल का पादार्पण।
(बाबू अम्बुज शर्मा)
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