सेनारी के फैसले के बाद सकते में दिल्ली के नक्सल समर्थित वामपंथी
सेनारी नरसंहार मामले में आज फैसला आ गया. दस को फांसी की सजा मिली और तीन को आजीवन कारवास. इस तरह वे अपने अंजाम तक पहुँच गए. लेकिन इस फैसले से जहानाबाद से ज्यादा सन्नाटा दिल्ली के वामपंथियों में पसरा हुआ है.दर्दे दिल ये है कि कोई कुछ कह नहीं सकता. दर्द अंदर ही अंदर दबाना होगा. क्योंकि जिन हत्यारों को आज मौत की सजा मिली है वे सब इन्हीं वामपंथियों की नाजायज औलाद है.
दूसरों को शांति का पाठ पढाने वाले और रणवीर सेना के नाम पर स्यापा करने वाले वामपंथी भोले-भाले लोगों का ब्रेनवास कर नक्सली बनाते हैं और बाद में नरसंहार करवाते हैं.इसलिए कोर्ट के फैसले आज उन्हें जोर का झटका लगा है.ये वही लोग हैं जो बथानी टोला में आरोपित के दोषमुक्त होने पर हंगामा मचाते हैं मगर सेनारी हत्याकांड में 23 हत्यारों के छूटने पर जश्न मनाते हैं. बहरहाल इनका दर्दे दिल में हम समझते हैं मगर क़ानून इतना भी अंधा नहीं होता जितना वामपंथी समझते हैं.अब कोर्ट से जवाब मांगते रहिये.



