युवा मन कोमल होता है और देश-काल व् परिस्थिति का उसपर ज्यादा असर होता है.तब वह कई बार अपने आक्रोश को अपने तरीके से प्रकट करता है. कविता एक ऐसा ही माध्यम है. नीचे प्रकाशित कविता भी कुछ ऐसी ही है.एक युवा भूमिहार की किसी खास स्थितयों में लिखी गई कविता जिसमें कुंठा का स्वर उभर कर सामने आता है. हालाँकि हम इससे इत्तेफाक नहीं रखते. कर्म करने पर फल मिलता ही है. बस सूत्रवाक्य है कर्मठता. पढ़िए एक युवा भूमिहार की कुंठा में लिखी कविता – 
bhumihar brahmin

भूमिहार……!

काश! की मैं भूमिहार ना होता, तो यूँ जीने को मजबूर ना होता।

दसवीं मे पढ़ाई कर करके, ये मोटा सा चश्मा गर लगाया ना होता,

तो गर्ल फ्रेंड से यूँ पराया ना होता,

काश! की मैं भूमिहार ना होता,

कॉलेज अड्मिशन मे धके खा ख़ाके,

ये जूता गर मेरा घिस्सा ना होता,

तो माँ की आँखों मे यूँ आँसू ना होता,

काश! की मैं भूमिहार ना होता,

इंटरव्यू मे प्रश्नोतर की जगह,

अगर! मैं हरिजन बोला होता, तो अपने पास भी एक जॉब होता,

काश! की मैं भूमिहार ना होता,

ज़िंदगी मे जब भी ज़रूरत आन पड़ता,

हरिजन बनाना तब मुझे भता,

गाड़ी,बंगले,नौकर सब मैं पाता,

काश! की मैं भूमिहार ना होता,

—-अमू।

साभार – नवोदय.कॉम
-भूमिहार मंत्र की टिपण्णी :
युवा भूमिहार की किसी खास स्थितयों में लिखी गई कविता प्रतीत होती है। कर्मठ लोगों के लिए किसी युग में अवसरों कई कोई कमी नही रही है। आप जो हैं उसपर गर्व करें। यदि सच्ची चाहत हो तो किसी की भी तरक्की को कोई नही रोक सकता। अपनी अवनति के लिए किसी जाति पर दोषारोपण अनुचित है।