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| स्वर्गीय कृष्णानंद को श्रद्धांजली देते भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी |
उत्तरप्रदेश का मोहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र कुख्यात अंसारी बंधुओं के नाम से काँपता है. मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी और सिब्गतुल्लाह अंसारी की दहशत के आगे जब किसी की ज़बान नहीं खुलती थी तो सामने खड़े होने का सवाल ही कहाँ पैदा होता था.
“कृष्णानन्द राय को भारी पड़ा था मोख्तार अंसारी के भाई को हराना, हुई थी हत्या”
गाजीपुर. कहते हैं मोहम्मदाबाद में राजनीति फाटक से शुरू होती है और फाटक पर ही खत्म होती है। इसी फाटक के पीछे लगती है बाहुबली मोख्तार अंसारी, उनके भाई पूर्व सांसद अफजाल अंसारी और सबसे बड़े भाई मोहम्मदाबाद विधायक सिब्गतुल्लाह अंसारी का दरबार। यह भी माना जाता है कि गाजीपुर की राजनीति को फाटक जिस तरफ चाहे मोड़कर रख दे। मोहम्मदाबाद में ही अंसारी बंधुओं का पैतृक निवास है। इस सीट पर अंसारी बंधुओं का कब्जा 1985 से है। बीच में 2002 में इस सीट को भाजपा के दिग्गज नेता कृष्णानन्द राय ने अंसारी बंधुओं से छीन लिया। अंसारी बंधुओं को हार का मुंह देखना पड़ा। पर यह सीट छीनना कृष्णानन्द राय को रास नहीं आया। कार्यकाल पूरा करने के पहले ही 29 नवंबर 2005 को उनकी हत्या हो गई। उपचुनाव में स्व. राय की पत्नी सहानुभूति की लहर में जीत तो गईं पर इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में सीट पर फिर अंसारी बंधुओं का कब्जा हो गया। तब से लेकर अब तक मोख्तार अंसारी के बड़े भाई सिब्गतुल्लाह अंसारी इस सीट से विधायक हैं।
लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में वापसी करते हुए अंसारी बंधुओं ने सबसे बड़े शिवगतुल्लाह अंसारी सपा से चुनाव जीत गए। तब से अबतक शिवगतुल्लाह अंसारी इस सीट पर विधायक बने हुए है। इस बार भी चुनाव में फिलहाल कौमी एकता दल, भाजपा और सपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला तय माना जा रहा है। पर यदि कौएद का सपा में विलय या फिर गठबंधन हो जाता है तो समीकरण अंसारी बंधुओं के लिये मुफीद साबित हो सकता है। सीट पर मुस्लिम वोटों की तादाद अधिक होने और ध्रुवीकरण की स्थिति के चलते एकतरफा वोटिंग हमेशा अंसारी बंधुओं के पक्ष में होती है। इसके अलावा दलित वोटों के साथ ही इनकी भूमिहार वोटों में भी सेंध मानी जाती है।




