NDTV एक ऐसा चैनल है जहाँ आप तमाम ऐसे लोगों को भाषण देते देख सकते हैं जो प्रगतिशील होने के नाम पर राष्ट्रविरोधी, हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित आदि का जाप साल के 365 दिन करते रहते हैं. ख़बरों में जाति ढूँढना और किसी भी एंगल से उसे हाईलाईट करके भुनाना एनडीटीवी इंडिया का पुराना शगल है. 
लेकिन दलित-मुस्लिम-पिछड़े-कश्मीर आदि का कार्ड शातिराना तरीके से खेलने वाला ये चैनल अकेला नहीं है. बल्कि इसका एक अपना एक पूरा नेक्सस है जिसमें आधे से ज्यादा तो जेएनयू और बाकी सारे घाघ वामपंथी हैं. 
कांग्रेस सरकार द्वारा पोषित वामपंथी जेएनयू में अय्याशी करते हुए और एनडीटीवी पर प्रवचन देते हुए अच्छा वक्त गुजार रहे थे कि तभी राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की एंट्री हो गयी. बस उसके बाद से ही इनका हाजमा खराब है और रातों की नींद गायब है. क्योंकि मोदी सरकार एक-के-बाद एक वामपंथी घेरे को तोड़ रही है और इनके फैलाए प्रोपगेंडा के चिथड़े उड़ा रही है. 
पहले जेएनयू पर सरकार की तिरछी नज़र पड़ी. अभी उस सदमें से ये उबरे भी नहीं थे कि मुंहदिखाई वाला प्रगतिशील चैनल एनडीटीवी सरकार के निशाने पर आ गया और गलत तरीके से पठानकोट में रिपोर्टिंग करने के कारण उसपर सांकेतिक रूप से एक दिन का प्रतिबंध लगाया गया.
फिर क्या था वामपंथियों में हाहाकार मच गया और सारे वामपंथी अपने-अपने बिलों से निकलकर आपातकाल की दुहाई देने लगे. लेकिन दरअसल देश में नहीं वामपंथियों के राष्ट्रविरोधी मुहिम पर आपातकाल लगा है और उसी से वे NDTV पर लगे बैन से तिलमिलाए हुए हैं. आखिर बौद्धिक विमर्श के उनके सबसे मज़बूत गढ़ पर जो हमला हुआ है. बेचारों के लिए एक ही दालान तो था जहाँ बौद्धिक जुगाली सब करते थे. वो दालान भी आधा ढह गया. ये तो बड़ी नाइंसाफी हो गयी. हैं न रवीश बाबू. अच्छा आप तो कुछो नहीं बोलेंगे, आपका स्टूडियो का प्राइम टाइम वाला लोलना बोलेगा. 

ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र