अरविंद रॉय –
ब्राह्मण और समाज सुधार :भीमा कोरेगांव से कुछ लोग अपनी पॉलिटिक्स की दुकान चमकाने के लिए मूर्खता के सबसे निम्न स्तर पर आ गए है ,, कई दलितों को ये दम्भ और खुशफहमी पाले देखा है fb पे कि , आज वो जो भी है अंबेडकर और सिर्फ आंबेडकर की वजह से है… यदि केवल “संविधान संकलन” ही इसका कारण है तो फिर बाबा साहेब की जगह जो भी ड्राफ्ट करता वो भी यही सब करता जो उनने किया,,, मगर सामाजिक धार्मिक सुधार तो आंबेडकर से पहले शुरू हुए और वो करने का साहस किसी दलित में नहीं था,,स्थितियां इतनी विषम थीं कि दलित जीने के लिए भी सवर्णों के मोहताज थे और ये इतिहास का सबसे काला पन्ना है, ये मानने में कोई ऐतराज नहीं मुझे। मगर मैं ये भी जानता और मानता हूँ कि आज के दलितों के सभी सामाजिक अधिकारो की लड़ाई सिर्फ सवर्णों ने लड़ी श्री कृष्ण सिंह , राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद, केशवचंद्र सेन , देवेन्द्र नाथ टैगोर, आत्माराम पांडुरंग, pt सुंदरलाल शर्मा ये सभी ब्राम्हण थे इनमे भी महादेव गोविन्द रानाडे तो चित्पावन थे जिनको दलित विरोधी ही माना जाता है, दयानद सरस्वती महात्मा गांधी घनश्याम दास बिड़ला सभी सवर्ण थे और हिन्दू धर्म की कुरीतियों के लिए आगे आये थे … इनके सहयोग के बिना किस दलित ने आगे आने की हिम्मत की ?? और आज ये आरक्षण पर सवार होकर कुतर्क करते रहते है और सब की अनदेखी भी … मैंने आज तक किसी दलित नेता को दलितों का भला करते नहीं देखा ,हाँ वो सक्षम होकर अपना भला जरूर करते है । याद रखिये सवर्णों_के_support_के_बिना देश तरक्की नहीं कर सकता रोजगार पैदा नहीं हो सकता इसलिए इस सहयोग का सम्मान करना सीखना चाहिए … साथ मिलकर देश को बेहतर बनाने की जगह गलत तथ्यों की आग जलाना भी कम अपराध नहीं !!!
ब्राह्मण और समाज सुधार :भीमा कोरेगांव से कुछ लोग अपनी पॉलिटिक्स की दुकान चमकाने के लिए मूर्खता के सबसे निम्न स्तर पर आ गए है ,, कई दलितों को ये दम्भ और खुशफहमी पाले देखा है fb पे कि , आज वो जो भी है अंबेडकर और सिर्फ आंबेडकर की वजह से है… यदि केवल “संविधान संकलन” ही इसका कारण है तो फिर बाबा साहेब की जगह जो भी ड्राफ्ट करता वो भी यही सब करता जो उनने किया,,, मगर सामाजिक धार्मिक सुधार तो आंबेडकर से पहले शुरू हुए और वो करने का साहस किसी दलित में नहीं था,,स्थितियां इतनी विषम थीं कि दलित जीने के लिए भी सवर्णों के मोहताज थे और ये इतिहास का सबसे काला पन्ना है, ये मानने में कोई ऐतराज नहीं मुझे। मगर मैं ये भी जानता और मानता हूँ कि आज के दलितों के सभी सामाजिक अधिकारो की लड़ाई सिर्फ सवर्णों ने लड़ी श्री कृष्ण सिंह , राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद, केशवचंद्र सेन , देवेन्द्र नाथ टैगोर, आत्माराम पांडुरंग, pt सुंदरलाल शर्मा ये सभी ब्राम्हण थे इनमे भी महादेव गोविन्द रानाडे तो चित्पावन थे जिनको दलित विरोधी ही माना जाता है, दयानद सरस्वती महात्मा गांधी घनश्याम दास बिड़ला सभी सवर्ण थे और हिन्दू धर्म की कुरीतियों के लिए आगे आये थे … इनके सहयोग के बिना किस दलित ने आगे आने की हिम्मत की ?? और आज ये आरक्षण पर सवार होकर कुतर्क करते रहते है और सब की अनदेखी भी … मैंने आज तक किसी दलित नेता को दलितों का भला करते नहीं देखा ,हाँ वो सक्षम होकर अपना भला जरूर करते है । याद रखिये सवर्णों_के_support_के_बिना देश तरक्की नहीं कर सकता रोजगार पैदा नहीं हो सकता इसलिए इस सहयोग का सम्मान करना सीखना चाहिए … साथ मिलकर देश को बेहतर बनाने की जगह गलत तथ्यों की आग जलाना भी कम अपराध नहीं !!!
(कोई तथ्य गलत हो तो plz सुधार करें)




