सक्षम नेता के अभाव में भूमिहारों के राजनैतिक अस्तित्व पर लगातार संकट के बादल मंडरा रहे हैं.बिहार से लेकर उत्तरप्रदेश तक में यही हालात हैं.अबतक भाजपा को भूमिहार फ्रेंडली माना जाता था, लेकिन अब वो भी धीरे-धीरे किनाराकशी करने लगा है. वजह साफ़ है कि वर्तमान समय में भूमिहारों का राजनीतिक वजूद घटा है.इसी पर अमर उजाला ने एक संक्षिप्त रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें उ.प्र.के संदर्भ में बताया है कि कैसे कल्पनाथ राय के निधन के बाद भूमिहार हाशिए पर आ गए. पेश है पूरी रिपोर्ट –
मऊ. एक जमाना था जब जिले की पहचान ही भूमिहार जाति के नेताओं से होती थी। लेकिन विकास के नाम पर जिले का सृजन करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. कल्पनाथ राय की वर्ष 1999 में देहांत के बाद से इस जाति के लोग उनकी विरासत को नहीं संजो पाए। हालत यह है कि पहले तो चुनाव मैदान में उतरे भूमिहार बिरादरी को जनता ने नकारा तो बाद में राजनैतिक पार्टियों ने। इसी का परिणाम है कि वर्तमान विधान सभा चुनाव के लिए मनोज राय का टिकट कटने के बाद राजनीति के क्षेत्र में भूमिहार जाति हाशिए पर आ गई है।
23 लाख की आबादी वाले इस जिले में चारों विधान सभा क्षेत्रों को मिलाकर भूमिहारों की संख्या करीब डेढ़ लाख है। 6 अगस्त 1999 को पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय की मौत के बाद से जिला भूमिहारों की राजनीति से परे हो गया। आजादी के बाद घोसी लोकसभा और विधान सभा कम्युनिस्ट राजनीति का गढ़ माना जाता रहा। इस दौरान भी राजनैतिक इतिहास में भूमिहारों का वर्चस्व कायम रहा। जिले की राजनीति में भूमिहारों के प्रतिनिधित्व का आंकड़ा देखा जाए, तो आजादी के बाद हुए पहले चुनाव से लेकर 1998 तक के चुनाव में इसी जाति का बोलबाला रहा है।
कामरेड जय बहादुर राय के बाद साल 1968 से लेकर 1998 तक लगातार आठ लोकसभा चुनावों तक झारखंडे राय, शिवराम राय, राजकुमार राय के अलावा लगातार चार बार स्व. कल्पनाथ राय ने जीत दर्ज कराकर जनता का प्रतिनिधित्व किया। इसमें दो बार झारखंडे राय और एक बार राजकुमार राय और शिवराम राय ने प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा घोसी और मधुबन पूर्व में नत्थूपुर के नाम से जाने जानी वाली विधान सभा में झारखंडे राय, राजकुमार राय, विक्रमा राय आदि विधायक बनते रहे।
स्व. कल्पनाथ राय के निधन के बाद पहले तो कुछ चुनावों में विभिन्न राजनैतिक दलों ने इस जाति पर भरोसा जताया। लेकिन जनता ने नकार दिया। सुधा राय, सीता राय, मनोज राय, सिद्धार्थ राय, उत्पल राय, योगेंद्र नाथ राय आदि नेता किसी न किसी दल से चुनाव लड़े। लेकिन इस बार किसी दल ने भूमिहार को मैदान में नहीं उतारा है। (स्रोत – अमर उजाला)



