अलग अलग ग्रुप होने का अर्थ समाज का विखण्डन मत लगाईय़े 

arun kumar mp
स्वामी सहजानंद सरस्वती कार्यक्रम
राजधानी दिल्ली समेत देश भर में भू-समाज के कार्यक्रम चलते रहते हैं. ऐसे ढेरों कार्यक्रम होते हैं जिसमें समाज की ऐसी विभूतियों को याद किया जाता है जिन्होंने देश-दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है.लेकिन कई बार एक ही विभूति पर केंद्रित कार्यक्रम एक ही शहर में दो-दो बार मनाया जाता है. मसलन हाल ही में किसानों के नायक स्वामी सहजानंद सरस्वती को लेकर राजधानी दिल्ली में तीन दिन में दो-दो कार्यक्रम हुए. ये दोनों दो अलग-अलग संस्थानों ने आयोजित किया था.ऐसे में एक यक्ष प्रश्न है कि क्या ऐसा करने से समाज की एकता तो कहीं विखंडित नहीं होती. इसी मसले पर भू-समाज के ‘शैलेन्द्र कुमार’ ने अपनी बात रखी है. उनका कहना है विविध संगठनों और कार्यक्रमों से समाज का विखंडन नहीं होता, बल्की ताकत और बढ़ती है.पढ़िए उनकी पूरी टिप्पणी :
शैलेन्द्र कुमार-
दिल्ली में भू-समाज के कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित होते ही रहते हैं. मसलन कभी राष्ट्रकवि दिनकर जी की जयंती तो कभी विश्वप्रसिद्द लंगट सिंह कॉलेज के संस्थापक ‘लंगट सिंह’ की जयंती तो कभी नक्सलियों के काल बाबा ब्रह्मेश्वर मुखिया की जयंती तो कभी प्रतिभा सम्मान जैसे समारोह  अलग-अलग संगठनों द्वारा आयोजित होते रहते है.ऐसे में आपलोग सोचते होंगे कि ये सभी अलग-अलग संगठन और अलग अलग लोग करते हैं और इसका मतलब है कि हमारा समाज बँटा हुआ है | 
लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है.दरअसल ये सारे कार्यक्रम अलग-अलग लोगों द्वारा आयोजित भले किया जाता हो, मगर आपसी सहयोग और समन्यव से ही इसे क्रियान्वित किया जाता है. सबने अपनी-अपनी विशेषज्ञता के हिसाब से अपने-अपने कार्यों को बांट लिया है और समाज हित में जुटे हुए हैं. मसलन कुछ लोग भूमिहार समाज पर हुए अत्याचार के लिए सोशल मीडिया संभाले हुए हैं तो कुछ युवक एवं युवतियो के रोजगार और विवाह के लिये प्रयासरत है | इसलिए ऐसा सोंचना न्यायसंगत नहीं कि भूमिहार समाज असंगठित और विभक्त है.
भू-समाज के सभी लोग अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए एक-दूसरे का भरपूर सहयोग कर रहे हैं. समाज के दूसरे लोगों को भी ऐसा ही करना चाहिए और समाज की तरक्की में अपनी भूमिका निभानी चाहिए.
दरअसल इन सारी बातों का मूलमंत्र यही है कि समाज से जुड़कर रहिये और समाज मे आपस मे एक दूसरे का सहयोग कीजिये. फिर देखिये अपने समाज का उत्थान होने से कोई नही रोक सकता है| हम बुद्धिजीवी और शिक्षित समाज तो पहले से ही हैं., जरूरत है तो संगठित समाज बनाने का और ये सब आपसी मेलजोल और सहयोग से ही हो सकता है| इसलिये सभी लोग सभी कार्यक्रम मे आने का प्रयास कीजिये तभी हमलोग एक दूसरे को जान पायेंगे और एक दूसरे की मदद कर पायेंगे या ले पायेंगे| 
परशुराम वंशजों पर अगर अत्याचार होता है तो ट्विटर, फेसबुक आदि इसे Hi-light करने मे मदद करते है अत: हर परशुराम वंशजो का कम से कम एक ट्वीटर एकाउंट तो होना ही चाहिए | ( शैलेन्द्र कुमार)

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