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| विवेकी राय, साहित्यकार |
-उमेश चतुर्वेदी,वरिष्ठ पत्रकार-
विवेकी राय जी नहीं रहे…हिंदी में भोजपुरी गंवईं गंध की देसज आवाज आज थम गई…गाजीपुर की धरती सूनी हो गई…ललाते सूरज के आगमन की जब प्राची के क्षितिज पर आहट हो रही थी…ठीक उसी वक्त हिंदी का एक सूरज काशी में डूब रहा था..आजादी के बाद हिंदी राजधानी की मुखापेक्षी हो गई…साहित्यकार भी राजधानियों में सिमटने लगे..ऐसे माहौल में भी गाजीपुर में बंसखट, पुअरा, खरिहान, सरेह में रहकर हिंदी की सेवा करते रहे विवेकी राय…ढेरों यादें हैं..उनके सहज जीवन के…साहित्य में लोक परंपरा की आवाज का थम जाना हिंदी का बड़ा नुकसान है..लेकिन नियति के आगे किसकी चली है..उन्होंने लंबा जीवन जिया..संघर्षभरा जीवन…लेकिन बेदाग..साहित्य को पूरी तरह समर्पित…संबंधों को बिना बनावट से निभाने वाले राय साहब का नहीं रहना दुखी कर गया..हार्दिक श्रद्धांजलि.लेकिन बेदाग..साहित्य को पूरी तरह समर्पित…संबंधों को बिना बनावट से निभाने वाले राय साहब का नहीं रहना दुखी कर गया..हार्दिक श्रद्धांजलि



