जेएनयू का पूर्व अध्यक्ष और विवादास्पद छात्र नेता कन्हैया कुमार बिहार से है और बिहार के लोग अपनी कर्मठता और देशभक्ति के लिए जाने जाते हैं.लेकिन अफ़सोस की बात है कि कन्हैया तमाम ऐसे लोगों की गोद में जा बैठा है जो भारत देश से नफरत करते हैं और सदा अहित करने की सोंचते हैं.
बहरहाल ये कन्हैया का अपना निजी फैसला है, इसमें हम और आप क्या कर सकते हैं? पर अपने आप को जेएनयू का बौद्धिक मानने वाले कन्हैया को कम-से-कम लफ्फाजी से तो बचना चाहिए.लेकिन ऐसा प्रतीत नहीं होता. एक के बाद एक लफ्फाजी वाले बयान उसके आते ही रहते हैं.कभी सेना पर तो कभी पीएम मोदी पर. अब एक ऐसा ही एक बयान उसने फिर नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिया है और हवाला संस्कारों का दिया है.
आपको याद होगा कि जेएनयू प्रकरण जब ताजा-ताजा हुआ था तब कुछ समय बाद पहली बार कन्हैया बिहार गया था तो लालू यादव से मिलने के क्रम में पैर भी छू लिए थे जिसका सोशल मीडिया पर खूब मजाक उड़ा था कि भ्रष्टाचार से आज़ादी मांगने वाला चारा घोटाले के आरोपी के सामने लोट रहा है.
लेकिन शर्म उनको आती है जिनके संस्कार में शर्म नाम की चीज हो.मेनस्ट्रीम राजनीति में आने के पहले ही कन्हैया ने अपनी खाल इतनी मोटी कर ली है कि पूछिए मत. बहरहाल अभी कन्हैया ने एक किताब लिखी है. किताब का नाम है -“बिहार से तिहाड़’. इसी किताब पर बातचीत करने के लिए जब बीबीसी ने बुलाया और लालू के चरण छूने वाला सवाल पूछा तो कन्हैया ने ये जवाब दिया –
बीबीसी का सवाल: आपने लालू के पैर छुए थे?
कन्हैया का जवाब: किसी के पैर छूने से कोई आदर्श नहीं हो जाते. ये सस्कृति की बात है, मोदी जी अगर बिहार के होते तो उनके भी पैर छूता. मोदी ने संसद जाकर धरती चूमी थी….और आज एनडीटीवी पर बैन लगा दिया.
अब कॉमरेड कन्हैया से कोई पूछे कि बड़ों का अपमान करने की संस्कृति तुमने कहाँ से सीखी. ये तो हमारी संस्कृति नहीं. जरूर वामपंथी प्रोफ़ेसर ने सिखाई होगी.ख़ैर जो भी संस्कृति तुमने जहाँ से भी सीखी हो लेकिन लालू के चरणों में लोटते कन्हैया को ‘संस्कारों’ के नाम पर मोदी का नाम लेते थोड़ी शर्म तो आनी चाहिए. किस संस्कृति में लिखा है कि बड़ों का पैर छूने के लिए बिहार-गुजरात देखो.जान पड़ता है कि लाल सलाम की संस्कृति ने बुद्धि भ्रष्ट कर दी है ! पढ़िए कन्हैया का पूरा इंटरव्यू जो बीबीसी से साभार लेकर हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं –
सवाल: आपकी किताब को लेकर प्रतिक्रिया कैसी रही है?
कन्हैया: ये जानने का मुझे अभी मौका नहीं मिला है, क्योंकि दुख की स्थिति आजकल हम लोगों के लिए कैंपस में भी है और मेरे व्यक्तिगत जीवन में भी है. मेरे पिताजी का देहांत हुआ है. कैंपस से अभी एक लड़का गायब हुआ है. मुझे रिएक्शन जानने का मौका नहीं मिला है. रिएक्शन से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हमने अपनी बात कह दी है. लोगों को रिएक्ट करने की आज़ादी होनी चाहिए.
सवाल: नजीब के गायब होने को लेकर एबीवीपी और लेफ्ट दोनों का ही अलग स्टैंड है. आरोप-प्रत्यारोप की बजाय छात्र एक साथ क्यों नहीं आ रहे हैं?
कन्हैया: जब घर का मुखिया….होता है तो उनके बच्चे आपस में झगड़ा करते हैं. अगर वाइस चांसलर कड़े कदम उठाते तो ठीक रहता. आरोप-प्रत्यारोप इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं. अगर वाइस चांसलर कड़े निर्देश देते तो पुलिस काम करती. एक कड़े निर्देश की जरूरत थी. कड़े निर्देश से मेरा मतलब ये है कि आज अगर मुझे कुछ हो जाता है तो जब तक मेरे परिवार वाले नहीं आ जाते, तब तक ये ज़िम्मेदारी वाइस चांसलर की है. अगर एक बच्चा गायब हो रहा है तो ये आपकी नैतिक जिम्मेदारी है कि आप बच्चे का ख्याल रखें.
सवाल : आप शिक्षा की राजनीति करने की बजाय मुख्यधारा की राजनीति में क्यों आना चाहते हैं?
कन्हैया: मैं विद्यार्थी हूं. विद्यार्थी को लेकर जो जरूरी सवाल हैं शिक्षा और रोजगार, मैं उन्ही को लेकर लड़ता हूं. जो मुख्यधारा की पार्टी है, सत्ता या विपक्ष…हम सवाल पूछते हैं. ऐसे में किसी भी सवाल को हम अलग करके नहीं देख रहे हैं. मेरा ख्याल है कि अगर लोग मुख्यधारा को चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं तो मैं चुनाव से दूर हूं. आंदोलन वाला आदमी हूं और आंदोलन करना है इस देश के लिए…
सवाल: आपके लिए राष्ट्र की अवधारणा क्या है. जवानों के मारे जाने के बारे में आपकी क्या राय है?
कन्हैया: देश और राज्य की अवधारणा दो लोगों के लिए अलग हो सकती है. देश की जो सबसे मान्यतापूर्ण परिभाषा हो सकती है, उसको हमें देश के संविधान से उद्धरित किया जाना चाहिए. मेरे ख्याल से देश की परिभाषा संविधान से रेखांकित की जानी चाहिए. मज़दूर और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोग हों, या फिर सीमा पर काम करने वाले जवान हों, जो सारे लोग अपना काम नैतिक ईमानारी से काम कर रहे हैं, वो लोग देश को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. यही देशभक्ति है. और इसको एक-दूसरे के खिलाफ खड़े करने की बजाय, साथ लेकर चलने की सोच देश में बेहतरी ला सकती है.
सवाल: जवानों के मारे जाने पर आप लोगों की प्रतिक्रिया क्यों नहीं आती है?
कन्हैया: ये बड़ी अजीब स्थिति है. मेरे ख्याल से मैंने कभी किसी शहीद के खिलाफ कुछ नहीं बोला. मैं नहीं जानता कि मुझसे ये सवाल क्यों पूछा जा रहा है. जब देश की सीमा पर लोग शहीद होते हैं तो उनकी भी शहादत मनाई जाती है और जब किसान खेतों में शहीद होते हैं, तब भी. दोनों को लेकर शहादत मनाते हैं. देखिए मुझे तो याद है कि जब एक दीप शहीदों के नाम पर….बात कही गई तो पूरे देश में ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन ने दीप जलाया. लेकिन उसके साथ-साथ एक बात हम और बोलते हैं, एक दीप रोहित वेमुला के नाम का जलाते हैं, एक दीप किसानों के नाम जलाते हैं. एक दीप उन लोगों के नाम भी, जो सारी जिंदगी काम करते हैं.
सवाल: आपके आने से पॉलिटिक्स कैंपस से बाहर आ गई है?
कन्हैया: एक बड़े व्यंग्यकार हैं हरिशंकर परसाई. मैं व्यंग्य की तरह ये कह रहा हूं कि मेरे गांव में एक भेड़िया घुस आया है. उसे गांव से भगाने के लिए गांव से बाहर आना पड़ा है. सत्ता का जब भी यूनिवर्सिटी की स्वायत्ता पर हमला होता है, वो जब कैंपस में घुसते हैं, जहां उनको नहीं घुसना चाहिए, विद्यार्थियों को मजबूरन बाहर आना पड़ता है. और जब वो बाहर आते हैं तो उन्हें जेल के अंदर कर दिया जाता है. ये इमरजेंसी के वक्त भी हुआ था और ये आज भी हो रहा है.
सवाल: आपकी किताब में कई चैप्टर हैं. पटना, जेएनयू, चाइल्डहुड, तिहाड़, अब अगला चैप्टर आपकी जिंदगी में क्या होगा?
कन्हैया: उससे अगला शब्द होगा रोजगार. अभी मैं पीएचडी कर रहा हूं. पीएचडी करने के बाद इसे जमा करूंगा. फिर कहीं नौकरी लूंगा. जहां नौकरी मिलेगी, वहां रहूंगा. और जैसी इंसान की आदत होती है, सवाल उठाने की…सवाल उठाते रहेंगे. पीएचडी करने में 30 साल लग जाते हैं. अगर लेक्चरशिप की नौकरी लगती है तो रिटायरमेंट होने की उम्र जो सरकार ने तय की है, वो 65 की है. तो हम 65 की उम्र में रिटायर हो जाएंगे. मैं अभी चुनाव नहीं लड़ूंगा.
सवाल: आपने लालू के पैर छुए थे?
कन्हैया: किसी के पैर छूने से कोई आदर्श नहीं हो जाते. ये सस्कृति की बात है, मोदी जी अगर बिहार के होते तो उनके भी पैर छूता. मोदी ने संसद जाकर धरती चूमी थी….और आज एनडीटीवी पर बैन लगा दिया.
सवाल: कन्हैया की वजह से जेएनयू की छवि खराब हुई है?
कन्हैया: मैंने इसलिए ही किताब लिखी है कि लोगों के दिमाग में जो नैरेटिव पहुंचाया गया है, उसे बदलना है. मेरी कौन सुनेगा. स्वामी को सब सुनते हैं. जेएनयू बहती धारा के खिलाफ खड़ा होता आया है. आगे भी होता रहेगा.




