दलित के नाम पर रोटी और बोटी खाने वाले बौद्धिक वामपंथी और छद्म प्रगतिशील ये भूल जाते हैं कि ‘दलित’ शब्द के पहले प्रयोगकर्ता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर थे और दिनकर जी कौन थे ये बताने की जरूरत है क्या? ये बात भूमंत्र नहीं,बल्की नामचीन साहित्यकारों का कहना है.पढ़िए पूरी रिपोर्ट-

कबीर जैसी दृष्टि और तुलसी जैसी भावाभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता वाले हिन्दी के शीर्षस्थ कवि रामधारीसिंह दिनकर के काव्य में प्रखरता मार्मिकता और जनता की बदहाली के प्रति हाहाकार नजर आता है। वे साहित्य में दलित शब्द का प्रयोग करने वाले पहले लेखक थे।राजधानी में रामधारी सिंह दिनकर जन्मशती संगोष्ठी पर ‘दिनकर की आवाज का वैशिष्ट्य’ विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ कवि और संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष अशोक बाजपेयी ने ये एक बार कहा था कि हर वक्त का महत्वपूर्ण कवि प्रतिरोध करता है और दिनकर ने भी परंपरा को सिरे से खारिज करने का प्रतिरोध किया। उन्होंने दिनकर को आखिरी बड़ा कवि बताते हुए कहा कि उस दौर में जब साहित्य में लघुता और सामान्यता का बोध अधिक था। ऐसे में दिनकर के काव्य में विराटता और महात्वाकांक्षा झलकती है।

उन्होंने कहा दिनकर ने उत्तर छायावादी कविता के तेवर से अलग महाकाव्यात्मक कविता लिखी और सबसे अधिक छंदकाव्य और आलोचनात्मक कविताएँ लिखीं। प्रगतिवादी आंदोलन के विपरीत दिनकर ने राष्ट्रीयता पर जोर दिया। उन्होंने कहा दिनकर मानते थे कि कविता व्यक्ति द्वारा संपादित सामाजिक कार्य है। आजादी के बाद इकबाल को गुरु कहना किसी सामान्य कवि के बस की बात नहीं हो सकती। हालाँकि तात्कालिकता के दबाव और राजनीतिक महात्वाकांक्षा के चलते उनके काव्य को क्षति हुई।

इस मौके पर साहित्य मर्मज्ञ मैनेजर पांडे ने दिनकर को काजी नजरूल इस्लाम और इकबाल की परंपरा का कवि बताते हुए कहा कि दिनकर के आंदोलनधर्मी होने के कारण उनके साहित्य में सामाजिक आक्रोश दिखाई देता है। इसमें जनता की बदहाली पर हाहाकार और आह्वान है। उन्होंने कहा कि उनके साहित्य में प्रखरता और मार्मिकता के साथ कबीर की दृष्टि और तुलसी की तरह बात कहने की क्षमता दिखाई देती है। हिन्दी साहित्य में दलित शब्द का प्रयोग करने वाले वह पहले लेखक थे। पांडे ने कहा कि दिनकर सामाजिक-राजनीतिक चेतना के कवि थे, जिनके काव्य में गौरवशाली और पतनशील राजनीति की झलक दिखाई देती है। उनका गाँधीवाद और मार्क्सवाद के साथ आलोचनात्मक संबंध रहा है। केन्द्र में गाँधी को रखकर दिनकर ने भ्रष्टाचार की चर्चा की है, वहीं मार्क्स की जमीन पर खड़े होकर गाँधीवाद की आलोचना की है।

गौरतलब है कि दिनकर ने ज्ञानपीठ पुरस्कार के दौरान पढ़े गए व्याख्यान में कहा था कि वे पूरी जिंदगी मार्क्स और गाँधी के बीच झूलते रहे। उजले और लाल के बीच गुणा करने से जो रंग बनता है,वही उनकी कविता का रंग है। उन्होंने कहा दिनकर के साहित्य में महाभारत की तरह परंपराबोध विद्रोह, विवाद और बौद्धिक विमर्श दिखाई देता है। कुरूक्षेत्र और रश्मिरथी उनकी महाभारत पर आधारित रचनाएँ हैं।

(साभार – वेबदुनिया)