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 भूमिहारों की पार्टी को लेकर विमर्श और गरमाता जा रहा है। शैलेन्द्र, गौरव, अमित आदि के बाद भूमिपुत्र ‘चित्रेश’ ने भूमिहारों की पार्टी को लेकर कुछ और नए मुद्दे उठाये है। इसमें पार्टी कैसे चले, इसपर सवाल उठाते हुए उन्होंने सुझाव पेश भी किए हैं। साथ ही उन्होंने देशी किसान पार्टी के चुनावी हश्र पर भी प्रकाश डाला है। इस पार्टी को बाबा ब्रह्मेश्वर के नाम का सहारा लेने के बावजूद चुनाव में करारी शिकस्त मिली। पढ़िए उनका पूरा आलेख –
चित्रेश शर्मा

चित्रेश शर्मा, छात्र, इंजीनियरिंग – 

भूमिहार ब्राह्मण पार्टी की परिकल्पना: हकीकत है या फ़साना 

भूमिहार राजनीति में लगातार हाशिये पर जा रहे हैं। बिहार में हुए वर्तमान राजनीतिक हालत इसकी बानगी पेश करते हैं. राज्य में कुछ साल पहले तक भाजपा,जदयू और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूमिहार ब्राह्मण समाज से थे लेकिन आज स्थिति बदली हुई है। ‘भूमंत्र’ पर चर्चा हो रही है कि क्या भूमिहार ब्राहमण की एक पार्टी होनी चाहिए? मेरा मानना है कि पार्टी बनाना आसान है,उसे सफल बनाना मुश्किल।

 भूमिहार पार्टी की असफल कहानी ‘देशी किसान पार्टी’

मुखिया जी के पुत्र और अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के अध्यक्ष इंदुभूषण जी ने भी एक राजनीतिक पार्टी ‘देशी किसान पार्टी’बनायीं है जो सफलता से मीलों दूर प्रतीत हो रही है।

 भूमिहार पार्टी को भाजपा से ख़तरा 

पार्टी बनाने के बाद विरोधियों द्वारा उस पर कठोर हमले किये जायेंगे।सबसे कड़ा हमला होगा भाजपा की ओर से जिसका भूमिहार समाज अभी समर्थन कर रहा है।विरोध करना भी लाज़मी है क्योंकि भूमिहार ब्राह्मण भाजपा का ठोस वोटबैंक है जिसे किसी भी हालत में वह खोना नहीं चाहेगी।बेबुनियाद दुष्प्रचार किये जायेंगे वो भी सामने से नहीं दलालों के माध्यम से।आम जनता भी अपनी परंपरागत राजनीतिक पार्टी को इतनी आसानी से छोड़ना नहीं चाहेगी।इसलिए जल्दबाजी में लिया गया निर्णय आत्मघाती होगा।

मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है

पार्टी खड़ी करने के लिए हमें ठोस पहल करनी होगी।जैसे सोशल मीडिया पर जितने भी भूमिहार समाज के पोर्टल हैं सभी में आपसी समन्वय स्थापित कर के एक मंच पर लाया जाये।भूमिहार बहुल क्षेत्रों में जाकर लोगों से फीडबैक लिया जाये क्योंकि दलालों द्वारा यह भी प्रचार किया जाता है कि आपसे पूछकर पार्टी बनाई गई थी।पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपनी पुरानी पार्टी की विचारधारा को त्याग कर नए एजेंडे के साथ आगे बढ़ना होगा।यदि कार्यकर्त्ता सम्पूर्ण लगन व निष्ठा से काम करेंगे और नेता उचित नेतृत्व प्रदान करेंगे तो हम जरूर सफल होंगे। अंत में ‘दिनकर’जी के शब्दों के साथ ख़त्म करता हूँ- ख़म ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़ । मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।

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