हिंदी में संभवतः विवेकी राय पहले स्तंभकार हैं जिनका स्तंभ लगातार किसी एक पत्र में तेरह सालों तक छपता रहा. विवेकी राय का ‘आज’ का मशहूर स्तंभ ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ , रविवार में ‘गाँव की बात’ और जनसत्ता के मुंबई संस्करण में ‘अड़बड़ भइया की भोजपुरि चिठ्ठी’ अबतक उनके पुराने पाठकों को याद है. लेकिन उनकी पत्रकारिता का मूल्यांकन अभी बाकी है. पढ़िए डॉ.विवेकी राय पर यथावत पत्रिका में प्रकाशित उमेश चतुर्वेदी का आलेख –




