प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले विकास के एजेंडे की बात करते हो,लेकिन असल में विकास के एजेंडे पर आज भी वोट और जाति का एजेंडा हावी है. उत्तरप्रदेश के चयन के वक़्त ये बात एक बार फिर प्रमुखता से सामने आ गयी. कई दिनों के रहस्य के बाद अचानक से योगी आदित्यनाथ को सामने कर उनकी ताजपोशी कर दी गयी और मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे मनोज सिन्हा को जातीय गोलबंदी में फंसाकर दृश्य से गायब कर दिया गया. इस संबंध में अग्रणी ऑनलाइन पोर्टल ‘फर्स्ट पोस्ट’ ने एक दिलचस्प पोस्ट की है. फर्स्ट पोस्ट लिखता है – 
शनिवार सुबह तक रेस में सबसे आगे चल रहे केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा की साफ-सुथरी छवि, मोदी सरकार में उनका बेहतर परफॉर्मेंस सब जातिय समीकरण के स्पीड ब्रेकर में फंस कर रह गया. विधानमंडल दल की बैठक से पहले दिन में दिल्ली में अचानक तेज हुई सियासी हलचल ने मनोज सिन्हा को रेस से बाहर कर दिया. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से यूपी बीजेपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और संगठन मंत्री सुनील बंसल ने मुलाकात की. सूत्रों के मुताबिक, इस मुलाकात के दौरान इन दोनों की तरफ से मनोज सिन्हा के नाम का विरोध किया गया. खासतौर से भूमिहार जाति से आने वाले मनोज सिन्हा को लेकर इनका तर्क था कि इतनी कम आबादी वाली जाति से आने के बावजूद उन्हें कमान देकर अच्छा संदेश नहीं दिया जा सकता. इन नेताओं की तरफ से पार्टी आलाकमान को बार-बार ये समझाने की कोशिश की गई कि यूपी के भीतर मनोज सिन्हा की ताजपोशी से सामाजिक समीकरण नहीं साधा जा सकता. बीजेपी के यूपी प्रभारी ओम माथुर भी मनोज सिन्हा के मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले के साथ नहीं खड़े थे. आखिरकार मोदी-शाह की जोड़ी की पसंद होने के बावजूद मनोज सिन्हा जाति के मकड़जाल में उलझकर रह गए और योगी आदित्यनाथ बाजी मार ले गए. 
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