आरक्षण लागू किए हुए भले कई दशक बीत गए हो, लेकिन आरक्षण की राजनीति अब भी जोर-शोर से चल रही है. आरक्षण वाले और अधिक आरक्षण मांग रहे हैं तो जनरल कैटगरी वाले जातिगत आरक्षण का विरोध कर रहे हैं. बहुत बड़ा तबका जातिगत आरक्षण की बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहा है. लेकिन पिछले कुछ समय से अलग-अलग राज्यों में कुछ अगड़ी जातियों ने भी आरक्षण की मांग शुरू कर दी और कई जगहों पर इसे लेकर आंदोलन का गुबार भी उठ खड़ा हुआ. इनमें प्रमुख है जाट, पटेल और मराठा. इनकी देखा-देखी और नेताओं की नेतागिरी के चक्कर में कई और राज्यों की ऐसी अगड़ी जातियां भी आरक्षण की मांग करने लगी है जो अबतक जातिगत आरक्षण का विरोध कर रहे थे. अब ऐसी ही कुछ सुगबुगाहट बिहार में भी सुनाई दे रही है. भूमिहार ब्राह्मण समुदाय के कुछ भटके युवा अचानक से भूमिहार आरक्षण आंदोलन की मांग करने लग गए हैं. उनकी मांग है कि भूमिहार को भी आरक्षण मिलना चाहिए. हालाँकि भूमिहारों के किसी भी नेता ने इस आंदोलन को अबतक कोई समर्थन नहीं दिया है और न इसके समर्थन में कोई बयान दिया है. फिर भी एक ख़ास वर्ग इसे आंदोलन बनाने की मुहिम में लगा हुआ. वे ये नहीं सोंच रहे कि इसके क्या दूरगामी असर होंगे?
दरअसल भूमिहार आरक्षण की मांग करना आत्मघाती कदम होगा. पहला तो यही होगा कि जातिगत आरक्षण के विरोध की आपकी हवा निकल जायेगी. एक तरह से आप हंसी के पात्र बन जायेंगे कि जातिगत आरक्षण का विरोध करते-करते अब खुद ही भूमिहार जातिगत आरक्षण की मांग करने लग गए. राजनीतिक रूप से नुक्सान ये होगा कि भूमिहारों को गरीब-गुरबों, वंचितों और दलितों का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया जाएगा. यानी निशाने पर ये समुदाय आ जाएगा जबकि ये तय है कि भूमिहार आरक्षण जैसा कुछ भी होना लगभग असंभव है. हाँ युवाओं को बरगला कर इसपर राजनीतिक रोटी जरुर सेंकी जा सकती है.
सीधी सी बात है कि सरकार यदि भूमिहारों को आरक्षण देती है तो उसे दूसरी कई और जातियों को भी इस श्रेणी में रखना होगा और न रखने पर प्रबल विरोध का सामना करना पड़ेगा. हालाँकि ये बात सही है कि भूमिहार समुदाय की आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में कमजोर हुई है और यहाँ भी एक बड़ा तबका गरीबी में जिंदगी गुजार रहा है. इनके लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग की जा सकती है. लेकिन भूमिहार आरक्षण की मांग अपने पैर पर कुल्हारी मारने की तरह होगा.
दरअसल आरक्षण की आग को हवा देकर नेता सिर्फ अपने वोट की रोटी सेंकते हैं. वही आरक्षण को पहले खाद-पानी देते हैं और फिर विरोध की आग को भी सुलगाते हैं. आप उनके कल-पुर्जे बनकर समय मत गंवाइए. पढ़ -लिखकर टॉपर बनिए. आरक्षण आपके जूते के नीचे होगा.
वैसे कहा जाता है कि कहा जाता है कि बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ.श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) भूमिहार ब्राह्मणों को मायनोरिटी की श्रेणी में डालना चाहते थे. लेकिन प्रभावशाली भूमिहारों के विरोध करने के कारण उन्होंने इरादा छोड़ दिया. तत्काल पैर पीछे खींच लिए.
सोशल मीडिया पर इसी मुद्दे पर आयी कुछ प्रतिक्रियाएं –
राजीव कुमार – आरक्षण आर्थिक आधार पर करने की माँग होनी चाहिए नाकि जातिगत आधार पर जैसा कि ” भूमिहार आरक्षण आंदोलन ” का नाम देकर करने का प्रयास किया जा रहा है । जातिगत आरक्षण का तो हमें विरोध करना है और हम करते भी हैं तो फिर ये भूमिहार आरक्षण आंदोलन कहाँ से आ गया । ध्यान रखिये सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी । भूमिहारों को अगुआ बनाकर और भड़काकर कोई आपको मोहरा तो नहीं बना रहा है जिससे भूमिहार बदनाम हो जाए ।
बीरेंद्र सिंह – भूमिहार आरक्षण आंदोलन से डर है की 90के दशक का पूर्ण वृति न हो जय इस लिये आर्थिक आधर पर होना चाहिये !ताकि सभी समुदाय जाती ,धर्म के लोगो का साथ मिले
Kamlesh Vikal – जिसने अपनी बौद्धिक क्षमता और बाहुबल से दुनिया को ललकारा हो और उनके वंशज दीनहीन की भाँति दया का पात्र बने यह सोचनीय है। अपनी खोई हुई मेधा शक्ति को जगाने की जरूरत है , अपनी संस्कार को सिरोधार्य करने की जरूरत है न की आरक्षण की ।
श्री विदेह – आप आरक्षण का विरोध कीजिये. लेकिन भूमिहार को आगे रख कर मत कीजिये. करना है तो सवर्ण मंच टाइप कुछ बनाईये ओर बेहतर हो कि सर्व समाज मंच के तौर पर कीजिये. भूमिहार को आगे रखकर लड़ना अन्य जातियों के सामने भूमिहार को उनका दुश्मन बनाना जैसा होगा.


