bhumihar aur rajnitik dhundhlapan
सबसे पहले समझते हैं कि हमलोगों ने अब तक चुनाव और राजनीति को लेकर क्या क्या प्रयोग किये है पिछले 30 सालों में और अपने समाज को नुक़सान हुआ या फ़ायदा उसका आकलन करते हैं .
  1. एक पार्टी का विरोध: 90 के दशक में लालू की आरजेडी की सरकार आई और आते ही यह सरकार आपको सामंतवाद, दलितों के शोषक के तौर पर घोषित करने में लग गई. नक्सलवाद को खड़ा कर आपके जमीन और प्रतिष्ठा धूमिल की जाने लगी. और आरजेडी की ओर से यह तब से लेकर अब तक यही होता आ रहा हैं. राजद अपने समाज को चारा की तरह इस्तेमाल कर अपना दलित वोट बैंक साधने का काम करती है. चुनाव के समय अपने समाज के लोगों की हत्या का सिलसिला शुरू हो जाता है. समाज भी इस दल को दुश्मन की नज़र से देखता रहा है. इसका भी कोई लाभ नही मिला क्यूँकि इसी को हथियार बनाकर भाजपा-जदयू आपके वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करती रही है. इस नीति का भी कोई लाभ समाज को नही मिला उल्टे राजद आपको अपना दुश्मन मान बैठी है. ऐसा करना भी अपने समाज के लिये नुक़सान दे रहा और यह प्रयोग भी फेल हुआ
  2. एक पार्टी एक गठबंधन के साथ एकमुश्त खड़ा होना: फिर आपने धीरे धीरे कैलाशपति मिश्र की पार्टी भाजपा को सप्पोर्ट करना शुरू किया और स्थापित भी किया बिहार में. तकरीबन पिछले 30 सालों से आपका एक मुश्त वोट इस दल को जाता है. इस दल के साथ जॉइंट होने के कारण जद-यू को भी. इन दलों के आका ने समझ लिया की भूमिहार का वोट जायेगा कहाँ, ये गठबंधन भी आपको ग्रांटेड लेने लगा और धीरे धीरे यहां भी आप हाशिये पर पहुँचा दिये गये. भाजपा के साथ जदयू लगातार बनी रही है जिसके नेता नीतीश कुमार का यह सोचना है कि भूमिहार जायेगा कहाँ हमी को न वोट करेगा. आज आलम है कि आप एक घटक के जर खरीद गुलाम वोट बैंक हो गये तो विपक्षी पार्टीओ के लिये अछूत और सिर्फ उनके वोट बैंक को साधने के लिये आप चारा बनते आ रहे हैं. कांग्रेस की चर्चा इसलिये नही कर रहा हूँ क्योंकि बिहार में ये अस्तित्वहीन हो चुका है. तो एक मुश्त किसी पार्टी को वोट देना उसके साथ चले जाने से भी समाज को फायदा नही मिला और यह मॉडल भी फेल हो गया.
  3. स्वजातीय कैंडिडेट को समर्थन करना: आपने प्रयोग किया अपने समाज के लोगों को जाति के नाम पर वोट करने का (अपने जाति बहुल सीट से), बहुत से लोगों लोकसभा, विधानसभा में भेज कर स्थापित नेता बनाया. पार्टियों ने भी आपके वोट बैंक साधने के लिये बीच बीच मे एकाध को टिकट राज्यसभा तो राज्यपाल बनाती रहती है लेकिन वास्तव में इन सबसे समाज को कोई फायदा न हुआ. जिनको जाति के नाम पर पार्टी का टिकट मिलता है जो हमारी जाति वाली सीट चुनते है लड़ने के लिये और जिनको जाति के नाम पर वोट देकर जितवाते है वह भी आपके लिये कभी खड़ा नही होता है कभी भी आपकी बात नही करता है.सोचिये की बिहार विधानसभा में ओके 19 विधायक होने के बाद आपकी आवाज कहीं सुनाई नही देती है. जब कही कुछ होता है तो इनके कान पर जूं तक नही रेंगती है इनको सोशल मीडिया पर हुड़का कर कुम्भकर्णी नींद से जगाना पड़ता है उदाहरण के लिये 2015 में सीकू राज की मौत की घटना हो या 2020 में घटित सिंदुआरी की. इनका आलम यह है कि इनके मुँह से एक बयान तक नही निकलता है. समाज के विकास की लिये प्लान तो बहुत दूर की बात है. तो जो लोग जाति जाति करके जीतते है उनके लिये अपनी जाति भी अछूत हो जाता है तो यह मॉडल भी फेल हुआ है.
  4. अपराधी-बाहुबली को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर आगे बढ़ाना: अपने समाज ने 30 साल पहले एक और प्रयोग किया (विरोधियों की साजिश कह सकते हैं). आधार था सामाजिक सुरक्षा का और इसके लिये अपने समाज के जो अपराधी चरित्र के थे उनको आगे किया गया कि जरूरत के समय ये लोग काम आयेंगे और समाज की प्रतिष्ठा की रक्षा करेंगे. आपने इन चोर, लुटेरे, मर्डरर सजायाफ्ता लोगों को भी विधानसभा से सन्सद तक पहुँचा दिया. समाज के नाम पर चुनाव जीतने वाले ये लोग भी कभी समाज के लिये खड़े नही हुये उल्टे हमारे समाज का ही नुकसान किया. इनलोगों ने सबसे अधिक हत्याये अपने समाज के लोगों की की. अपने समाज के युवाओं को अपने लाभ के लिये अपराधी बनाया. राजनीति का रसूख का इस्तेमाल खुद का रसूख और धनबल बढ़ाने में किया. इन्हें कभी भी समाज के लिये खड़ा होते या बोलते नही सुना गया, इन्होंने सैकड़ो करोड़ बनाये, अलग अलग पार्टियों को करोड़ो फंडिंग देते रहे अपने चुनाव और अन्य कामो के लिये लेकिन समाज के लिये एक कमरा तक नही बनवाया. तो आपका ये प्रयोग भी फेल हुआ.
  5. जातीय संगठन के नाम पर उसके चेहरे को आगे बढ़ाना: आजकल अपने समाज के नाम पर कई जातीय संगठन बने हुये है सब किसी न किसी व्यक्ति के चेहरा चमकाने का साधन है ताकि युवाओं में जातीय उन्माद पैदा कर उसका लाभ खुद की राजनीतिक महत्वकांशा की पूर्ति में ले सकें. सबको चुनाव ही लड़ना है और यही इनका एजेंडा है. न तो इनलोगों के पास समाज को लेकर कोई विजन है और न ही उसके कार्यान्वन का प्लान. कभी समाज को आरक्षण के नाम तो कभी एसटी-एससी ऐक्ट के नाम पर और फिर पार्टी बनाकर सब समाज की बात करने लंगेगे. समाज को ठगने का नया तरीका के अलावा कुछ नही. ऐसे लोग चुनाव में किसी बड़े गठबधंन से पैसे लेकर वोट कटवा की भूमिका निभाते है और कुछ नही. आपके क्षेत्र में सरकारी और प्रशासनिक मदद के लिये सबसे उपर्युक्त व्यक्ति आपके एरिया का विधायक या सांसद होता है इस बात को समझने की ज़रूरत है. हमारे समाज का नेता सब जरूरत के समय भी नही आते हैं और आये भी तो फ़ोटो सेशन और एक चिट्ठी लिखने के अलावा और कुछ नही करते हैं. इस प्रयोग का भी कोई लाभ नही मिला समाज को
निष्कर्ष: पिछले 30-40 साल में आपने हर तरह का प्रयोग कर लिया, समाज को कुछ मिलना तो दूर अपने बहन बेटियों की इज़्ज़त तक बचाना मुश्किल हो रहा है. पिछले 30 सालों में इस समाज को राजनीति से सिर्फ़ नुक़सान ही हुआ है।
तो सवाल है कि समाज को क्या करना चाहिये?
सबसे पहले हरेक विधान-सभा सीट में वहाँ के समाज के 3 प्रबुद्ध- गैर-राजनीतिक (नॉन-पोलिटिकल) लोगों  की टीम बनाई जाये  और उनको समाज के लिये निर्णय लेने के लिये अधिकृत किया जाय. कार्य प्रणाली और निर्णय करने का आधार निम्न होगा. (एक नेशनल टीम भी हो जो कोरडीनेट करेगी, इसकी चर्चा अगले पोस्ट में )
  1. हम अपनी जाति कें लिये खुल के काम करेंगे, यह बात खुलकर बोलना होगा जो भी कैंडिडेट चुनाव लड़ रहा है वे लोग हमारे पास आयेंगे वह हमारे समाज के लिए क्या करेगा इस पर हमारे नामित टीम से बारगेन करे.
  2. अपने दरवाजे सभी राजनीतिक दलों के कैंडिडेट के लिये खुले रखिये उन्हें आमंत्रित कीजिये, उन्हें बताईये की हमलोगों के पास इतना वोट है आप बताईये की आप हमारे समाज के लिये क्या कीजियेगा.
  3. आप किसी एक पार्टी के साथ नही जायेंगे बल्कि हरेक सीट पर वहां के कैंडिडेट से बात करेंगे कि वह आपके समाज के लिये क्या सोचता है क्या क्या करेगा अगर वह जीतेगा तो.
  4. हमारे यहां सबसे बड़ी समस्या ला-एंड-आर्डर का है इसमे आप कैसे मदद करेंगे?
  5. हरेक विधानसभा में हमलोगों का जो 3 डिमांड प्रायरिटी पर हो (जो वहाँ के लोकल क्षेत्र के लिये ज़रूरी हो वहाँ के लोकल लोग तय करें) पर वही बात रखेंगे और हरेक कंडिडेट से पूछेंगे की वह जीतने के बाद इसे कैसे पूरा करेगा.
  6. तीन स्पेसिफिक डिमांड पर बात रखनी होगी (हरेक विधानसभा क्षेत्र की माँग वहाँ के अनुसार होगी और यह माँग वहाँ के लोग तय करेंगे)
  7. यह सब खुले में होगा छिपकर नही होगा (वैसा नही होगा जैसा हरेक चुनाव के पूर्व हमारे नेता जहाज़ में बैठकर बंद कमरे में डील करके आ जाते है अंदर क्या बात की किसी को पता ही नही). जिससे जो भी बात होगी वह सब बातें अपने समाज के सोशल मीडिया के पर रखी जाएगी. सभी सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा की जाएगी.
  8. जिस भी कंडिडेट के हमलोग फाइनल डील करेंगे सहमत होने के बाद उनके साथ लिखित एग्रीमेंट बनेगा और उस पर हमारी तरफ़ से जो तीन लोग नामित किये गये थे और कंडिडेट के बीच साइन करेंगे. हमलोग इसमे आपको अपनी सारी वोट देंगे लेकिन जीतने के बाद आपको हमलोग के लिये जी जान से काम करना होगा, भले ही किसी विधानसभा में अगर हमारा वोट पाँच हज़ार ही क्यों न हो वह सब आपको मिलेगा.
  9. आप हमारी जाति के है सिर्फ इस नाते हम लोग आपको वोट दे देंगे अब यह नही चलेगा बल्कि आपको भी इसी प्रोसेस से गुजरना होगा. अब आप जाति के नाम पर हमलोगों को ग्रांटेड नही ले सकते हैं.
  10. जिस कंडिडेट के साथ हमारे समाज का करार होगा उसे इस बात की भी गारंटी देनी होगी की अगर वह जीत कर आयेगा तो हमारे जिला में DM/SP ईमानदार और कर्मठ लोगों को बनवायेगा न की चोर और करप्ट को ताकि क्षेत्र का समुचित विकास हो और हमलोग प्रशासन की के द्वारा भी टार्गेट न किये जायें
यही मॉडल आने वाला हरेक चुनाव में चाहे वह लोकसभा, विधानसभा या पंचायत चुनाव सबमें अपनाया जायेगा, अब ज़रा इस प्रयोग के फ़ायदे को भी समझिये
  1. अगर चुनाव से पहले आप हरेक सीट पर एक बेस्ट कैंडिडेट तय कर लेते है उसके सहयोग देने के ऑफर के बाद तो चुनाव जीतने के बाद यकीन मानिये वह आपके कहे पर दौड़ के आयेगा (हमारे समाज के नमकहराम नेताओं की तरह हर बार किसी घटना होने पर उनसे मदद की भीख नही मांगनी पड़ेगी). उसे अगली बार भी आपकी वोट और सप्पोर्ट चाहिए होगा इसलिय वह हमेशा आपके लिए काम करेगा.
  2. चुकी आप किसी एक दल के साथ नही गये हैं तो किसी दल से आपकी दुश्मनी भी नही होगी और न ही कोई दल आपकी मजबूरी का फायदा उठा पायेगा.
  3. चुकी आपने किसी पार्टी को न चुनकर हरेक सीट पर समाज के लिये बेस्ट ऑफर करने वाले कैंडिडेट के साथ जाना चुना और उसे वोट दिया तो इस स्थिति 70-80 प्रतिशत आपके समर्थित लोग ही जीत कर पहुचने वाले कैंडिडेट होंगे तो सरकार किसी की भी बने उसमें आपके लिये खड़े होने वाले लोग होंगे ही. इसलिये सरकार किसी की भी बने आपका समाज उस सरकार के निशाने पर नही होगा.
  4. अपराधी और करप्ट पोलिटिशियन जिनको राजनीतिक दल पैसे लेकर आपकी जाति बहुल सीट बेच देती है उस पर भी लगाम लगेगी साथ ही साथ जो लोग समाज को अपने जागीर समझकर अपने जगह अपनी बीबी, भाई, बेटे को टिकट दिला देते हैं ऐसा करने से भी डरेंगे. इससे कम से कम आपके सीट बेचे जाने की प्रक्रिया पर भी रोक लगेगी और पढ़े लिखे अच्छे कंडिडेट को राजनीति में आने का मौक़ा मिलेगा.
  5. सबसे बड़ा फ़ायेदा समाज इस दिन रात की राजनीति से अपना ध्यान हटाकर अपना समय समाज निर्माण में लगा पायेगा जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वरोजगार, कृषि, आर्थिक सशक्तिकरण, कला, साहित्य और संस्कृति पर और एक मज़बूत समाज का निर्माण होगा
आप लोग अपनी राय कॉमेंट के माध्यम से ज़रूर बतायें 

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