Swami ParangKushaCharya

-अरविन्द रॉय

भूमिहार ब्राह्मण संत स्वामी पराङ्कुशाचार्य एक समाज सुधारक और वैष्णव भक्त संत थे। जिस समय इनका जन्म हुआ, उस समय देश में संतों के द्वारा समाज सुधार का कार्य किया जा रहा था। देश में स्वतंत्रता आन्दोलन का विगुल 1857 में बज चुका था। इन्होंने सरौती,गया,बिहार को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। संस्कृत विद्यालयों की स्थापना के द्वारा वंचित तबकों तक संस्कृत शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए आपने अनथक परिश्रम किया। आपकी जीवनी तथा समसामयिक सामाजिक स्थितियों से ज्ञात होता है कि सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में भक्ति और संस्कृत शिक्षा को आपने एक औजार की तरह प्रयोग में लाया। यही कारण है कि आपकी रचना में प्रपत्ति और शिक्षा का समन्वय देखने को मिलता है। आप संस्कृत के नदीष्ण विद्वान् नहीं थे, वरन् संस्कृत के प्रचारक और आश्रयदाता की भूमिका का निर्वाह किया। पुण्यतीर्थ गया उस समय भी कर्मकाण्ड का केन्द्र था। मगध के समकालीन विद्वान् कर्मकाण्ड ग्रन्थों की रचना कर खुद को श्रेष्ठ संस्कृत विद्वान् मान रहे थे। उसी समय सहजानन्द सरस्वती भी समाज सुधार के क्षेत्र में सक्रिय थे। इन सभी का प्रभाव आप पर पहुंचना स्वाभाविक था। आपका जन्म एक छोटे से ग्राम महमत्पुर में हुआ था। उत्तर भारत के मंदिरों को मुगलों ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। इस क्षेत्र में भव्य और विस्तृत मंदिर नहीं थे। भक्ति हेतु आकर्षण का कोई महनीय केन्द्र नहीं था। आपने अपने गुरु राजेन्द्राचार्य के साथ दक्षिण प्रदेशों के मंदिरों को देखा और अभिभूत हो गये।बुद्धिजीवियों से निरंतर सम्पर्क के कारण अपने यहाँ हो रहे सामाजिक भेदभाव को पहचाना। उस समय शाकद्वीपीय ब्राह्मण भुमिहार ब्राह्मण को कमतर मानते थे। अकर्मण्य भुमिहार को कर्मण्य भुमिहार ब्राह्मण तक की यात्रा कराने में इन्हें कई अवरोधों का सामना करना पडा। संस्कृत नहीं पढना, कर्मकाण्ड नहीं कराना ही भुमिहारों की अकर्मण्यता थी। ये इसे हेय कर्म मानते थे। जातीय समकक्षता के लिए संस्कृत का ज्ञाता होना आवश्यक था। यही एक अस्त्र था, जिसके बलबूते सामाजिक विषमता को चुनौती दी जा सकती थी। संस्कृत अपनाने और प्रचार की पृष्ठभूमि अलग होने कारण आपकी परम्परा को संस्कृत की अन्य धारा से पृथक कर देखना अनिवार्य होगा। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए पुकार सुनाई नहीं देती। परन्तु इतना सत्य है कि इनके द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केन्द्रों से शिक्षित होकर अनेकों ने रोजगार के अवसर पाये।
स्वामी पराङ्कुशाचार्य ने दक्षिण बिहार विशेषतः मगध क्षेत्र में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु संस्कृत में कर्मकाण्ड के ग्रन्थों का लेखन, जनजागरण तथा अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। आपने मगही बोली में अर्चा गुणगान की रचना की । मगही बिहार राज्य के मगध क्षेत्र में बोली जाने वाली एक बोली है। दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित देवविग्रह के स्वरुप तथा यहाँ द्रविड संस्कृत के मेल से उत्पन्न प्रपत्ति के सिद्धान्त को मगही में प्रतिष्ठित करने वाले एकमात्र संत रहे हैं। मेरा सौभाग्य कि मैं इनके साहित्यिक अवदान तथा मगध में संस्कृत को प्रतिष्ठा दिलाने में इनकी भूमिका पर चर्चा करुँगा। मगध,काशी से होते हुए इनकी वाणी भारत के अन्य भूभाग तक पहुँच चुकी है तथा इसका प्रभाव अब देश विदेश में भी शीघ्र दिखने लगा है। आपके शिष्य रंगरामानुजाचार्य ने आपको विशेष प्रसिद्धि दिलायी। पराङ्कुशाचार्य दक्षिण भारत में उद्भूत रामानुजीय वैष्णव परम्परा के सन्त थे। अर्चा गुणगान में विष्णु के स्वरुप में पूजित होने वाले श्रीनिवास वेङ्कटेश एवं रङ्गनाथ के अंग प्रत्यंगों, करुणा, प्रपत्ति तथा उनके ऐश्वर्य का ठीक वैसा ही वर्णन किया जैसा कि यामुनाचार्य के आलवन्दार स्तोत्र में किया है। कृपालो हे कृपा करके प्रभो क्यों ना चिताते हो। बहुत अपराध जन्मों से किया है मोह के वश हो पंक्ति में अपराधसहस्रभाजनं की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। भक्तगण जब अर्चा गुणगान के पदों को गाते थे तो पराङ्कुशाचार्य प्रभु भक्ति में भावविभोर हो नृत्य करने लगते थे। इस क्षेत्र के हर गायक का सपना होता है कि इनके द्वारा रचित भक्ति पदों को अपने अंदाज में स्वर दें। ऐसा इसलिए भी कि इनके गीत क्षेत्रीय भाषाई विरासत को तो समेटे है ही गायकों को भीतर तक शान्ति का अनुभव कराता है। कई गीतकारों ने आपके सम्मान में गीतों की रचना की है एवं गायकों ने भी उसे स्वर दिया है। इस प्रकार के गीत हुलासगंज एवं इससे सम्बद्ध संस्थाओं के धार्मिक आयोजनों एवं यज्ञों में सुने जा सकते हैं।
परांकुशाचार्य के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के समकालीन घटनाक्रम, क्षेत्र की शैक्षणिक स्थिति को जानना भी आवश्यक है। कोलकाता, रांची, गया तथा वाराणसी आदि मगध का निकटवर्ती संस्कृत शिक्षा का क्षेत्र था। यहाँ पर संस्कृत की स्थिति पर दृष्टिपात करना आवश्यक होगा, क्योंकि मगध क्षेत्र के लोग इन्हीं विद्या के केंद्रों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। वे इन विद्या केंद्रों से प्रभावित हो रहे थे। इस कालखंड में एक और ईसाई मिशनरियों के द्वारा शिक्षा सुधार लाया जा रहा था। कोलकाता, वाराणसी आदि स्थानों में नए-नए विश्वविद्यालय स्थापित हो रहे थे। अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा केंद्र तथा एक भारतीय संत के द्वारा शिक्षा केंद्र की स्थापना में मौलिक अंतर यह था कि जहां अंग्रेज भारतीय रीति रिवाज परंपरा को समझकर भारतीयों पर शासन करने के लिए शिक्षा केंद्र स्थापित किये, वहीं भारतीय संत के द्वारा वंचितों को मुख्यधारा से जोड़ने का जद्दोजहद दिखता है।
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित सुप्रीम कोर्ट कोलकाता में जूनियर जज पर तैनात विलियम जोंस 1783 में कोलकाता आये। उन्होंने कोलकाता में संस्कृत व्याकरण और काव्य की बारीकियों को पढ़ कर जाना। विलियम जोंस कानून, दर्शन, धर्म, राजनीति, नैतिकता, अंकगणित, चिकित्सा विज्ञान आदि विषयों की गहन जानकारी के लिए संस्कृत विद्या का अध्ययन कर रहे थे। इसी समय हेनरी टॉमस कोलब्रुक तथा नैथे नीयल हॉलहेड संस्कृत भाशा सीखकर संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद कर रहे थे। यह सभी भारतीय विरासत को समझने के प्रयास में लगे थे। इसी समय जोन्स ने इनसे मिलकर एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल का गठन किया तथा वहीं से एशियाटिक रिसर्च शोध पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। श्रीमती योगमाया देवी बिहार के संस्कृत शिक्षा में स्त्रियों के लिए अलग पाठ्यक्रम बनाए जाने तथा बिहार संस्कृत कन्वोकेशन में महिला प्रतिनिधि को शामिल कराने के लिए संघर्ष कर रही थी। बिहारी छात्राओं की सफलता नामक लेख में सरस्वती देवी लिखती है कि 1931 के अप्रैल में योगमाया देवी ने महिलाओं में संस्कृत के प्रचार के लिए अलग कोर्स बनाने की मांग बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली में की थी। बिहार संस्कृत एसोसिएशन की संचालिका सभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की भी मांग की। जिस समय पंडित ईश्वरदत्त शास्त्री के सभापतित्व में वाराणसी में आयोजित अखिल भारतीय संस्कृत छात्र संघ का अधिवेशन हो रहा था और महिलाओं को संस्कृत शिक्षा में अधिकार दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी जा रही थी, उस समय भूमिहार ब्राह्मण भी संस्कृत शिक्षा से बंचित थे। इससे यह तो स्पष्ट हो चुका है कि उस समय स्त्रियों तक संस्कृत शिक्षा नहीं पहुंच पा रही थी। वैष्णव संतो द्वारा स्थापित संस्कृत के शिक्षा केंद्रों में भी स्त्रियों के लिए संस्कृत शिक्षा देने हेतु कोई व्यवस्था नहीं की गई, इस प्रकार संस्कृत शिक्षा से एक बहुत बड़ा वर्ग उपेक्षित रह गया। ईसाई मिशनरियों का बहुत बड़ा केंद्र रांची था। वे पलामू,हजारीबाग सहित अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में निरंतर लगे हुए थे। फादर कामिल बुल्के भी भारत में मिशनरी स्कूलों में अध्यापन के लिए पधारे थे परंतु संयोग ऐसा कि वह राम के चरित्र से प्रभावित होकर भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में प्रचलित रामकथाओं का संकलित करने में अपना जीवन अर्पित कर दिया। फादर कामिल बुल्के भी संस्कृत की शिक्षा ग्रहण किये। हरिनारायण शर्मा ने अपने भूखंड पर दानापुर के कैंट रोड पर मुस्तफापुर,खगौल में 1901 में वेद रत्न विद्यालय की स्थापना की गई। बाद में इसे देबघर स्थानान्तरित कर यहाँ वेदरत्न उच्च विद्यालय की स्थापना की गयी। आप आर्य समाज के अनुयाई तथा आयुर्वेद के ज्ञाता थे । यहां से संस्कृत विद्या प्राप्त कर अनेकों विद्वानों ने शिक्षा पाई। इन सभी घटनाक्रमों से तरेतपाली तथा सरौती का शिक्षणकेन्द्र असम्बद्ध दिखता है, क्योंकि पराङ्कुशाचार्य एक प्रपत्ति के साधक थे,जिसके लिए संस्कृत शिक्षा अनिवार्य है। जातीय समकक्षता पाने में संस्कृतविद्या सहायक थी। तबतक शिक्षा का माध्यम संस्कृत ही हुआ करता था, इनके द्वारा गुरुकुल में बालकों को संस्कृत शिक्षा दी जाती थी, ताकि वे जगह जगह जाकर कर्मकाण्ड करा सकें। भारतीय समाज में महिलाओं द्वारा कर्मकाण्ड कराने की परम्परा नहीं थी इस कारण से भी संस्कृत शिक्षा में आधी आवादी उपेक्षित रह गयी। कुल मिलाकर परांकुशाचार्य एक शिक्षाविद् न होकर एक धार्मिक संत थे, जो एक वर्ग विशेष में संस्कृत को पहुंचाने का सार्थक कार्य कर रहे थे। अतः इस परिधि में रहकर इनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर विचार करना चाहिए।
पराङ्कुशाचार्य दक्षिण भारत के आलवार परम्परा से थे,जहाँ ज्ञान के स्थान पर भक्ति का अधिक महत्व था। इन्होंने अपनी भक्ति और कर्मसाधना से ईश्वर को प्रत्यक्ष किया। स्वयं पराङ्कुशाचार्य ने स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की थी,परन्तु सूर, कबीर,मीरा आदि मध्यकालीन भक्त संतों की तरह इन्होंने भी भक्तिभाव से ओत प्रोत लगभग 65 पदों की रचना की हैं। इनके द्वारा लिखित अधोलिखित पुस्तकें श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य संस्कृत संस्कृति संरक्षा परिषद् , हुलासगंज, जहानाबाद से प्रकाशित हैं।

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