बात 1958-59 की है। गया कॉलेज गया के संस्कृत विभाग में एक महत्वपूर्ण समारोह में श्री बाबू मुख्य अतिथि थे। उनसे सभा को संबोधित करने का निवेदन किया गया ।श्री बाबू ने अपना भाषण संस्कृत में आरम्भ किया । आयोजकों ने सोचा कि शायद दो-चार वाक्य , फिर हिंदी मेँ बोलेंगे । जैसे आज-कल के नेता जिस प्रदेश में जाते हैं एक-दो संबोधन के वाक्य क्षेत्र विशेष की भाषा में लिखकर ले जाते हैं ।
मगर दस मिनट बीत गये औऱ संस्कृत में ही भाषण जारी । आयोजकों को चिन्ता हुई । तब साहस कर विभागाध्यक्ष ने हिंदी में बोलने का अनुरोध किया । श्री बाबू ने कहा कि मैं तो समझा कि संस्कृत विभाग का समारोह है तो संस्कृत में बोलूँ ! फिर शेष भाषण उन्होंने हिंदी में दिया । ऐसे थे हमारे नेता ! और आज ! रटी-रटाई शपथ की दो पंक्तियाँ भी देखकर शुद्ध-शुद्ध नहीं पढ़ने वालों की भरमार है ।
आखिर क्यों न हो ? चपरासी और सिपाही के लिये भी योग्यता चाहिये, पर विधि-निर्माताओं के लिए पढा-लिखा होना जरूरी नहीं ।
बिहार-केसरी की पुण्यतिथि पर सादर निवेदित। नमन ।
Ramsuchit Sharma
(कृषक ब्रह्मऋषि के वॉल से साभार)

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