Ravindra Rai ditched
-राम पदारथ सिंह 

~राजनीति का बेदर्द कत्ल ~

स्व.श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के सपनों को कंधा देकर जिस अटल आडवाणी की जोड़ी ने पार्टी को इस मुकाम तक पहुंचाया उन्हीं के वंशजों की काली करतूतों के कारण आज आपका मस्तक झुक गया है। अजीब खेल होता है सत्ता और समय का! जो पार्टी झारखण्ड गठन काल से पूर्ण बहुमत पाने को पसीना बहाती रही और बार बार असफल होती रही को मोदी जी का चमत्कारी नेतृत्व और आपके राजनीतिक कौशल के कारण14 में 12 सांसद और वर्ष 2015 के विधान सभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से स्थायित्व प्राप्त हुआ,पर आज जातीय संक्रमण की रक्त रंजित तलवार से मेरा कत्ल कर डाला गया। यूं कहें कि झारखण्ड का इकलौता भूमिहार चेहरा को दूध में पड़ी मक्खी की भांति बाहर फेंक दिया गया।
Ram Padarath Singh
राम पदारथ सिंह

सही दिशा और स्पष्ट नीति की संवाहक रही भाजपा में प्रभारी बन फिरते इन चंद बेचारों को क्या मालूम कि जिस व्यक्ति को एक दलबदलू नेत्री के खातिर अपमानित कर पृथ्वी राज चौहान सम पत्थर की स्टिच्यु(संयुक्ता के स्वयंबर के समय)बना डाले उनके दादा कभी बिहार विधान सभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया करते थे। राय जी खुद दो-दो टर्म का विधायक एवं मंत्री रह चुके हैं, प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में एक शानदार पारी खेली है। प्रोफेसर के रूप में कॉलेज की सेवा में कार्यरत हैं।झारखण्ड में स्वजातीयों के आइकॉन सहित अन्य जातियों में अच्छी खासी प्रतिष्ठा है। देखा जाय तो झारखंडी नेताओं में मूलवासी के तौर पर इस कद का कोई दूसरा चेहरा अभी तक नहीं है।अपने प्रदेश अध्यक्ष काल में पार्टी के सांगठनिक नीव को इतनी मजबूती दी की बाद में मन मतलबी नॉमिनेट किये गए प्रदेश अध्यक्ष चाईबासा में चैन की नींद सो रहे हैं और संगठन आज भी ऊर्जावान है।ऐसे व्यक्तित्व का झाखण्ड/बिहार में से किसी एक संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी नहीं बनाया जाना घोर अपमान है।जब मेरे पैतृक राजनीतिक भूमि को बेच ही दी थी तो पार्टी लम्बे समय से सस्पेंन्स में रखे जनकपुर की भूमि चतरा ही दे देती।इसमें स्थानीयता की मांग करने वाले बहुत हद तक उतावले भी नहीं होते और राज्य का सामाजिक समीकरण भी बना रह जाता।

नहीं राय का कद छोटा करो,ये छोटा बड़ा करने का चलन राजनीति का गुण दोष रहा है।याद करें एक वक्त ऐसा भी आया था जब मुझे प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए अर्जुन ने अपनी गाण्डीव निकालकर जयंत सिन्हा के डैडी और नाथों के राजा के साथ भीड़ गए थे।पार्थ के इस एहसान की चुक्ति को सारथी बनकर पार्टी के रथ को दुगनी ऊर्जा से हाँकते रहे पर होनी को कुछ और मंजूर था पार्थ(अर्जुन मुंडा) भितरघात के शिकार हो चुनाव हार गए और मैं अकेला पड़ गया, जिसकी सजा में सांसदी की सीट के टिकट से वंचित होना पड़ा।

अरे भाई एक खाश जाती का होने के कारण जब टिकट काटना मजबूरी ही था तो कम से कम मेरे द्वारा बोये गए फसल में से ही किन्हीं योग्य कार्यकर्ता को टिकट देकर सम्मान की कुछ तो रक्षा करते। आपने मेरी बली उनके लिये ली जिनका शरीर भर केवल आपके पास रहेगा पर आत्मा भटकती रहेगी।विश्वास न हो तो इनके ही साथ चतरा में प्रवेश कराई गई बहना नीलम दीदी से पूछ लें।भगवा धारण करने की मनो कामना पूर्ण नहीं हुई और इनके आका जब जेल से निकलेंगे तो आपके लिए चाह कर भी रोक पाना मुश्किल होगा।

टिकट कन्फ़र्मेशन को अधिकृत आपके सर्वेयर जातीय संक्रमण से ओतप्रोत थे, तभी तो राजद परिवार के बड़े-बड़े लोगों को ही सिर्फ तोड़ा जा सका। काशः मेरा भी राजनाथ सिंह जी जैसा कोई आका दिल्ली में होता तो तेरी कुछ नहीं चलती।आका का क्या महत्व है इसे ऐसे समझा जाय की देश के कुल सिटिंग सीटों में चतरा से बद्तर रिपोर्ट कार्ड किसी क्षेत्र की नहीं रही होगी, फिर भी राष्ट्रीय नेतृत्व को भूपों के इंद्र शाह के दास और छोटे मोदी सुनील भैया का बाल बांका नहीं कर पाये। और अंततः सौदा सौदान सिंह के मनमर्जी पर हुई।

बहुत बड़े सौदागर होते हैं ये राजनीतिक दल वाले कभी इसी प्रकार लाल बाबू भी बड़े बेआबरू हो बाहर निकले थे जिन्हें वापस लाने को मुझे (राय जी)उनकी नई नवेली पार्टी में वर्षों साथ रहना पड़ा,पार्टी चल पड़ी, लालबाबु दौड़ने लगे,तब केंद्र के वरिष्ठ जनों के अनुरोध पर काफी कोशिश के बाद भी वे जब नहीं लौटे तो वापस लौटकर मैंने इनकी राजनीतिक कमर तोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।अगर मैं ऐसा नहीं किया होता तो ये लाल बाबू उड़ीसा के पटनायक और बिहार के कुमार जी की तरह झारखण्ड की सत्ता को कब का अपने कब्जे में कर लिए होते तब आप विपक्ष में बैठकर वर्षों तक झाल बजाते रह जाते..।

बड़े बेदर्द होते हैं आप लोग…