operation bhumihar

हालिया बिहार सरकार द्वारा जारी की गई जातिगत जनगणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में भूमिहार जाति को सवर्ण समुदाय की सर्वाधिक गरीब यानि पिछड़ी जाति बताया है। यह तो पहले से देखने में आ भी रहा था और अब स्पष्ट भी हो गया है कि पिछले 35 वर्षों में आरक्षण के दायरे में आने वाली बहुत सी तथाकथित पिछड़ी जातियां आर्थिक रूप से तथाकथित अगड़ी जातियों से बहुत आगे निकल गई हैं और आर्थिक विपन्नता अब सवर्ण समाज के अंदर आ गई है और उसमें भी भूमिहार समाज आर्थिक विपन्नता के मामले में सबसे खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। स्थिति इतनी भयावह और विकराल हो चुकी है कि भूमिहार समाज में गरीबी आज अन्य जातियों के मुकाबले सबसे अधिक हो चुकी है। फिर भी इसे सरकार की उदासीनता कहें या राजनेताओं द्वारा एक सोंचा समझा षड्यंत्र कि आर्थिक विपन्नता के कगार पर पहुंच चुके भूमिहार ब्राह्मण समाज को लेकर कोई कार्ययोजना नहीं बन रही। बल्कि इससे इतर बिहार सरकार ने भूमिहार समाज की इस आर्थिक बदहाली वाली रिपोर्ट जारी करने के पश्चात सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दायरा और बढ़ाते हुए इसे 75% कर दिया। अब इसे क्या कहेंगे कि एक तो वैसे ही सरकारी उदासीनता और आरक्षण की मार के चलते भूमिहार समेत तमाम तथाकथित अगड़ी जातियों में विपन्नता तेजी से बढ़ती जा रही है और उसके बावजूद सरकार द्वारा इन्हें और अधिक विपन्न बनाने के लिए नए नए षड्यंत्र रचे जा रहे हैं और इस वर्ग के लोगों को आर्थिक उपार्जन करने के सभी द्वार बारी बारी से बंद किए जा रहे हैं । अभी भी इसपर कोई सरकार द्वारा प्रभावकारी कदम नहीं उठाए जाते हैं तो आने वाले 20 वर्षों में भूमिहार ब्राह्मण समेत तमाम अगड़ी जातियों के समक्ष भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी। आज भूमिहार समाज की स्थिति यह है कि वो अंदर से कराह रहा है और उसे न उगलते बन रही है और न निगलते।

इसी संदर्भ में एक शायर के कुछ नज्म याद दिलाना चाहूंगा जो भूमिहार की दिली आवाज भी है :

आज की रात मेरा दर्द-ए-मोहब्बत सुन ले !
कँप-कँपाते हुए होठों की शिकायत सुन ले !
आज इज़हार-ए-ख़यालात का मौका दे दे !

ये दर्द आज हर भूमिहार के अंदर उभार ले रहा है और समय रहते इस दर्द का उपाय नहीं ढूंढा गया तो इस दर्द के कारण भूमिहार समाज भूखमरी का शिकार हो अपना अस्तित्व खो देगा।
इसलिए आर्थिक विपन्नता की ओर अग्रसर भूमिहार समाज को पिछड़ी जाति मानकर उस कोटि में अविलंब शामिल करने की जरूरत आन पड़ी है। इसपर सभी शासक एवं सामाजिक चिंतक लोगों को भी सहानुभूतिपूर्वक संज्ञान लेने की नितांत आवश्यकता है।

-भूमिपुत्र राजीव की कलम से