ऋषि भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है ।ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति ‘ऋष’ है जिसका अर्थ ‘देखना’ होता है ।ऋषि के प्रकाशित कृतियों को आर्ष कहते हैं जो इसी मूल से बना है, इसके अतिरिक्त दृष्टि (नज़र) जैसे शब्द भी इसी मूल से हैं। ब्रह्मर्षि का अर्थ हुआ ब्रह्म को देखने वाला समझने वाला वैसा ऋषि जो ब्रहाममय हो जाए उसका आचरण ब्रह्म के सामन हो ।
किन्तु क्या हम मे से कोई ऐसा है?  ब्रह्म ऋषि तो दूर ऋषि कहलाने के भी लायक नही फिर ब्रह्मर्षि नाम का ढोल पीटने का क्या अर्थ है? वैसे तो आज बहुत कम लोग है जो ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी है फिर भी गर जन्माधारित वर्ण व्यवस्था को ही मान कर चले तो ब्राह्मण केवल ब्राह्मण कहने मे क्या आपत्ति है?
आज न तो हम लोग इकलौते ऐसे ब्राह्मण समुदाय है जिसके अकेले के  पास जमीन है न हम राजा है न जमीन्दार फिर भूमिहार लिखने का भी औचित्य हमे समझ नही आता।
अब समय है याचक अयाचक कन्नौजिया सारस्वत गौड चितपावन भूमिहार  त्यागी आदि अलग अलग नामो को छोडकर केवल एक ध्वज ब्राह्मण ध्वज के नीचे आने की क्योकि आज कर्म और धर्म से सब लगभग एक एक जैसे है क्योकि अब सब का एक ही धर्म कर्म नजर आता है अर्थोपार्जन।
अब सोचने वाली बात ये है कि दण्डी स्वामी सहजानंद जी ने हमारे लिए ब्रह्मर्षि शब्द क्यो दिया?
तो मित्रो वो एक आदर्श शब्द से परिचित करवा कर गये है ताकि हम अपने पुरखो के पौरूष को याद रख सके और उन्हे आदर्श मान उनके जैसा बनने की चेष्टा करे एवम् उनकी मान मर्यादा को ध्यान मे रख आचरण करे।
किन्तु आज तो बात ही उलट है
ब्रह्म को जानने वाले ब्रह्मा और वो सृजन के कारक है । किन्तु मै दुःख के साथ कह रहा हू कि हमारे समाज के 99 प्रतिशत लोग विध्वंस के कार्यो मे संलग्न है।
ब्रह्म से जन्म ले ब्रह्म द्वारा पालित अंत मे ब्रह्म मे लीन हो जाते किन्तु आज भूमिहार युवा कलंक के साथ जन्म लेते (क्योकि राजनेताओ और वामपंथी लेखको के महिमा से हमे और राजपूतो को जन्मजात सामन्त सिद्ध करने का प्रयत्न निरंतर चल रहा है ) तो सामन्त का अर्थ वामियो की भाषा मे अत्याचारी है अर्थात् जन्मजात अत्याचारी का कलंक ले जन्म लेते मन मे जमीन्दार और शासक का झूठा अभिमान ले पलते और दंभ के दलदल मे फंस विनाश को प्राप्त हो जाते; इसी को उखाड फेंकने के लिए स्वामी जी ने ये शब्द दिया था ताकि तुम समझो बातो को आने वाले खतरो को और अपने पूरखो द्वारा प्रदत्त वास्तविक आचरण को आत्मसात कर कर्म से इन वामियो को गलत सिद्ध कर दो ।
समाज के लेखको को आज जय रणवीर जय रणवीर के स्थान पर दिनकर भृगु भार्गव जमदग्नि संकृति वशिष्ठ अगस्त्य आदि के गुणगान मे लिखना चाहिए।
आज जरूरत है समाज के सृजनात्मक स्वरूप से राष्ट्र  और जनसाधारण को अवगत करवाने की अन्यथा वामियो की चाल से अपनी स्थिति का अनुमाण स्वयम् लगा ले।
अरे अपनी और अपने कर्मो के जय जयकार करवाने का शौक क्षत्रियो को होता था ऋषियो को नही । ऋषि और ऋषि कुमारो का जय जयकार तो जनसामान्य से लेकर देव और दानव तक स्वयम् ऋद्धा से किया करते थे।
हमारा आचरण ऐसा हो कि आज जनता हृदय से हमे सम्मान दे और हमारी लेखनी को भी उसी दिशा मे कार्य करना चाहिए तभी हम ब्रह्मर्षि कहलाने के अधिकारी है
धन्यवाद्
।।जय जय महाकाल।।
।।बाबू अंबुज शर्मा।।
।।मगध पुत्र।।

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  1. आज कल लोग भूमिहार को ही जाति मान बैठे हैं| भूमिहार शब्द सबसे पहले 19 वी शताब्दी में सयुंक्त प्रान्त के दस्तावेजों में प्रतीत हुआ| यह शब्द भूमि (आईने अकबरी का) या भौमिक शब्द का पर्याय के रूप में उपयोग हुआ| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी कोर्ट के शब्दावली के अनुसार भूमिहार शब्द भूमि और हार शब्द से बना है, यह शब्दावली जनवरी 1855 में प्रकाशित हुआ था| भूमि का अर्थ है, अनुवांशिक भूसम्पत्ति जो कर से मुक्त हो (Bhoomi means a hereditary landed estate free of assessment) और हार का अर्थ है जो लिया हो या रखता हो(haar means who takes it)| प्रारंभिक 19वी शताब्दी में भूमिहार वो लोग थे जो अनुवांशिक भूसम्पत्ति रखने थे |[1][2] ये शब्द ब्राह्मण के भूमिधारी वर्ग के लिए भी उपयोग होता था जिन्हे बाभन या सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin) कहा जाता था और अन्य भूमिधारी लोग भी इस शब्द का अनुवांशिक भूसंपदा दर्शाने के लिए उपयोग करते थे|
    प्रारंभिक 20 शताब्दी तक भूमिहार शब्द जाति विशेष के लिए न हो कर बस भूमिपति होने का सूचक था| ब्राह्मण भूमिधारियों को बाभन या सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin) के नाम से जाना था| बाभन ब्रिटिश रिकार्ड्स में मिलिट्री ब्राह्मण के नाम से दर्ज थे[3][14][15]| बाभन जाति का नाम था और भूमिहार उसके भूस्वामी होने का सूचक था| 19 वी शताब्दी में कुछ जलनशील समुदाय के लोगों द्वारा बाभनो के बारे में मिथक और कल्पित कथा गढ़ा गया| जिसमे यह दिखाया गया बाभन शब्द का मतलब ब्राह्मण नहीं अपितु गिरा हुआ, पतित और मिथ्या ब्राह्मण है|[3a,b] 20 वी शताब्दी के प्रारम्भ (1906 और 1910) में बाभन और बाम्भन शब्द सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिला जो मगधन या मागधी प्राकृत भाषा में लिखा था[6][17]| ये बाभन शब्द मगही ब्राह्मणो के लिए प्रयुक्त हुआ था| इसके बाद कुछ इतिहासकारो ने यह अनुमान लगाना सुरु कर दिया की बाभन वो ब्राह्मण थे जो बौद्ध हो गए और बाद में हिन्दू बन गए| ये सिद्धांत एक कल्पना थी जो बाभन शब्द के शिलालेखों में मिलने के बाद की गयी | 1916 में रामप्रशाद चंद्र द्वारा ये दिखाया गया की बाभन शब्द अशोक के शिलालेखों में तो हैं पर उसमे ये कुछ भी नहीं कहा गया है की वो बौद्ध थे[6]| बाभन केवल मगधन भाषा (मागधी प्राकृत) का शब्द है और इसका संस्कृत में अर्थ ब्राह्मण है|[18] 19वी शताब्दी के अंत में कुछ समुदाय द्वारा बाभनो के बारे में मिथ्या और काल्पनिक कथा प्रचारित करने के प्रतिउत्तर में बाभन जमींदारों ने एक सभा का आयोजन किया जिसे बाद में भूमिहार ब्राह्मण सभा का नाम दिया गया| बाभन के बदले भूमिहार ब्राह्मण नाम प्रचारित करने का भार लंगट सिंह और अन्य भूधारी बाभनो को दिया गया| 1911 के ब्रिटिश जनगणना के उपरांत ही बाभन शब्द में भूमिहार ब्राह्मण शब्द जुडा| उसके पहले के जनगणना (जैसे 1872,1881,1891,1901,1911) में बाभनो को बस बाभन नाम से ही दर्शाया गया था|[5][10] संयुक्त प्रान्त में भूमिहार शब्द का उपयोग किया गया था और उसे भी बाभन का हिस्सा दिखाया गया था| आज वही भूमिहार ब्राह्मण नाम बस भूमिहार बन कर रह गया है| बाभनो को बाभन आदि काल से बोला जा रहा है, भूमिहार तो 19वी शताब्दी में मिली उपाधि है| आज के समय बाभन अपने प्राकृतिक और प्राचीन नाम से कम और अपने भूमिहार उपाधि से ज्यादा जाना जाने लगे है| स्वयं कशी नरेश (जिन्होंने भूमिहार ब्राह्मण नाम को बनाया और बढ़ाया) ने ब्रिटिश सरकार को लिखे पत्र में स्पस्ट किया था की भूमिहार कोई जाति नहीं बल्कि भूमि के कारोबार का सूचक शब्द है| जैसे मैथिल या कन्नोजीअ कहने से बस जगह का पता चलता है उसी तरह भूमिहार मात्र भूमिधारी होने का बोधक है| आज लोग भूमिहार को ही जाति मान बैठे हैं| जाति का नाम बाभन है और भूमिहार उसकी उपाधि है| जिस तरह राजपूत एक जाति का नाम है और ठाकुर उनका प्रशिद्ध उपाधि है उसी तरह बाभन या भूमिहार ब्राह्मण व भूमिधारी ब्राह्मण व सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin) जाति का नाम है और केवल भूमिहार उनका उपाधि है| जिस प्रकार ठाकुर शब्द हर जगह राजपूत जाति के लिए नहीं प्रयुक्त होता है |उसी प्रकार भूमिहार शब्द केवल बाभनो के लिए ही नहीं प्रयुक्त होता है| असम और छोटानागपुर में भूमिधारियों के लिए भूमिहार शब्द प्रयुक्त होता है जो बाभनो से किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े हुए हैं|[4] 20 वी शताब्दी के मध्य (अराउंड 1960) के बाद से बाभन शब्द का धीरे धीरे प्रतिष्ठित पत्रिका और पुस्तक से लोप होने लगा| अन्य ब्राह्मण समुदाय इसी समय यह शब्द अपने लिए प्रयोग करने लगे| 19वी और प्रारंभिक 20 वी शताब्दी तक बाभन शब्द का अर्थ पतित ब्राह्मण निकला जाता था और इसे भूमिपति होने के कारन भूमिहार कहा जाता था| यदि ये शब्द प्रारम्भ से ही सभी ब्राह्मणो के लिए प्रयुक्त होता तो बाभन शब्द को 19वी और प्रारंभिक 20 शताब्दी में अनादरसूचक नहीं बताया जाता[3][11][12][16]17]| सभी मिलिट्री ब्राह्मणो (military Brahman) को किसी न किसी काल में अनादर का सामना करना पडा है[3][15][14]| बाभनो को भी यह ज्ञान होना चाहिए की भूमिहार कोई जाति सूचक शब्द नहीं बल्कि भूमिपति होने का बोध करने वाला शब्द है| बाभन ही उनकी जाति का नाम है जो बृहद ब्राह्मण वर्ग का ही एक सैन्यकरण किया हुआ भाग है| बाभनो ( भूमिहार ब्राह्मणो ) जैसा सैन्य ब्राह्मण (Militarised Brahmin ) भारत के बिभिन्न भागो में अन्य नाम से जाने जाते है जैसे त्यागी , मोहयाल, चितपावन, नियोगी, अनाविल, अन्य (babhan are militarized Brahmin like mohyal, tyagi, chitpawan, niyogi, anavil, etc) | प्राचीन काल में ब्राह्मणो का सैन्यकरण(militarization) बस बिहार या उत्तर प्रदेश में ही नहीं हुआ था ये सारे देश में हुआ और वैसे सैनिक ब्राह्मणो का अलग पहचान है और उन्हें अयाचक ब्राह्मण भी कहा जाता है| ये सारे अयाचक ब्राह्मण परशुराम को अपना मूल पुरुष मानते हैं| मगध के प्राचीन ब्राह्मण, बाभन है और उनका इतिहास अशोक के समय से है| पुष्पमित्र शुंग और कनवा वंश मगध के प्राचीन ब्राह्मणो का है| प्राचीन मगध में सैन्य और प्रशाषन में बाभनो का महत्यपूर्ण योगदान रहा है| बाभनो का भूमिहार उपाधि 19 वी शताब्दी का है और ज़मींदारी हटने और भूमि सुधार होने के बाद इस शब्द का कोई अर्थ नहीं रहा|[5][6][8]
    References:
    [1] A glossary of judicial and revenue terms
    https://archive.org/details/cu31924023050762/page/n115
    [2] Hindu Castes and Sects: An Exposition of the Origin of the Hindu Caste yogendra nath bhattacharya
    https://archive.org/details/hinducastesands00bhatgoog/page/n132
    [3,a] The Tribes And Castes Of Bengal: Ethnographic Glossary, Volume 1 By Risley, Herbert Hope, Sir, (https://archive.org/details/TheTribesAndCastesOfBengal/page/n139
    [3,b] Census Of India 1901 Vol.1 (india ) (ethnographic Appendices) By Risley, Herbert Hope, Sir, (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55922/page/n199
    [4] Census of India, 1901 by India. Census Commissioner
    https://archive.org/details/cu31924071145571/page/n233
    [5]Peasants and Monks in British India by William R. Pinch
    Peasants and Monks in British India (https://publishing.cdlib.org/ucpressebooks/view?docId=ft22900465&chunk.id=s1.3.13&toc.id=ch3&toc.depth=1&brand=ucpress&anchor.id=d0e4900#X)
    [6] Indo-Aryan races: a study of the origin of Indo-Aryan people and institutions : Chanda, Ramaprasad
    (https://archive.org/details/Indo-aryanRacesAStudyOfTheOriginOfIndo-aryanPeopleAndInstitutions/page/n173)
    [7] Hindu Tribes and castes
    Hindu Tribes And Castes Vol 1 : Sherring : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.469749/page/n63)
    [8] Census of india 1901, Census of India, 1901 : India. Census Commissioner : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/cu31924071145571/page/n405)
    [9] East India (Census) [microform] : General report of the census of India, 1901
    ( https://archive.org/details/pts_eastindiacensusg_3720-1115/page/n513)
    [10]Census of India 1931 (Census Of India 1931 Vol.7 Bihar And Orissa Pt.1 Report : Lacey, W.g. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive)
    [11]. Statistical Account Of Bengal Vol.12 : Hunter, W.w. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.534069/page/n197)
    [12]. A Statistical Account Of Bengal Vol.xiii : W.w.hunter : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.279433/page/n237?q=babhan)
    [13]. Report of a tour in Bihar and Bengal in 1879-80. Vol. 15 : Cunningham, Alexander : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/pli.kerala.rare.12155/page/n121)
    [14]. A Manual of the Land Revenue Systems and Land Tenures of British India : Baden Henry Baden -Powell : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/amanuallandreve01powgoog/page/n247)
    [15]. Report On The Census Of Bengal(1872) : Beverley, H. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.94529/page/n217)
    [16]. Bengal District Gazetteers Sahabad : O’malley L. S. S. : Fre (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.206888/page/n59)e Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive
    [17]. Bengal District Gazetteers Darbhanga : O’malley L. S.s. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.206867/page/n55)
    [18] Journal of the American Oriental Society by American Oriental Society
    https://archive.org/details/journalvolume04socigoog/page/n90
    [19] Memoirs on the History, Folk-Lore, and Distribution of the Races of the North Western Provinces of India, Vol. 1
    https://archive.org/details/memoirsonhistory01henr/page/24 (inferior Brahman)
    [20] Imperial Gazetteer Of India Vol 2
    https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.281524/page/n225(inferior Brahman)
    [21] The Imperial Gazetteer Of India Vol Xxiii Singhbhum
    https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.61214/page/n285 (tekari raj)
    [22] Journal Of The Asiatic Society Of Bengal 1904 Vol Lxxiii Part I
    https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.280545/page/n191 (Hathua raj)

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