– सुधीर शर्मा

अनंत सिंह प्रकरण का एक अध्याय समाप्त हुआ।अब मामला न्यायालय के अधीन है या प्रशासन के स्तर पर पुनः जाँच का है।जिस तरह से प्रशासनिक तत्परता रही और पूर्वाग्रह ग्रस्त प्रक्रिया अपनाई गई उससे अनंत सिंह के पक्ष में आमलोगों की सहानुभूति बढ़ी है।किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति को यह लगता है कि जानबूझकर फँसाया गया है।
न्यायालय में आरोप टिक नहीं पायेगा यह लगता है।कोई स्वतंत्र गवाह तक पुलिस को नहीं मिला।लेकिन पूरे प्रकरण में नीतीश कुमार की छीछालेदर हुई और जनमानस में उनके खिलाफ वातावरण बना।ऐसा ही माहौल कमोबेश बरमेश्वर मुखिया हत्याकांड के समय हुआ था।जिनलोगों की साजिश के कारण मुखिया जी की हत्या हुई थी उन पर कार्रवाई नहीं करने के कारण समाज के गुस्से का निशाना नीतीश जी भी बन गए थे।

आज जो कुछ भी हो रहा है स्पष्ट है ललन सिंह के इशारे पर हो रहा है।वे अनंत सिंह का होमियोपैथी इलाज कर रहे हैं जैसा कि उन्होंने चुनाव के पहले कहा था।लेकिन नीतीश जी नेता हैं और बिहार के मुखिया हैं।उनको किसी व्यक्ति की लड़ाई का पक्ष नहीं बनना चाहिए था।वोट उनके नाम पर मिलता है और जबाबदेही भी जनता के प्रति उन्हीं की है।बाकी लोगों का क्या है ,नीतीश जी के कारण नेता हैं और सर्वोच्च सत्ता भोग रहे हैं।उनका सितारा अस्त होगा तो दूसरा ठिकाना ढूढेंगे और पहले ढूंढ भी चुके हैं।
पूर्व में नीतीश कुमार ने क्या नहीं दिया ललन सिंह को ?प्रदेश अध्यक्ष रहते जो ताकत ललन जी को थी, वह महेश बाबु और कैलाश पति मिश्र (कर्पूरी ठाकुर-रामसुंदर दास सरकार में)को छोड़कर भूमिहार समाज में किसी को नहीं मिली।सरकार ललन जी ही चला रहे थे।लेकिन सामाजिक सरोकार और संपर्क उनका नगण्य था।उनकी अपरिमित ताकत से समाज को कोई लाभ नहीं हुआ कुछ दलालों और ठीकेदारों को छोड़कर।ललन जी का दरवाजा आम भूमिहार के लिए बंद ही रहा। न तो ललन सिंह उस ताकत का उपयोग कर अपना व्यक्तित्व विस्तार कर सके न ही नीतीश कुमार के लिए समाज में मैसेज दे सके।

निःसंदेह नीतीश कुमार ने जो भूमिहार समाज को तवज्जो दिया वह श्री बाबु के समय के बाद पहली सरकार में मिली।लालु राज में बेवजह लड़ कर अपना सबकुछ दाव पर लगा चुके समाज को नीतीश राज में हर सम्मान मिला।ललन सिंह और विजय चौधरी दो-दो प्रदेश अध्यक्ष।पीके शाही और ललित किशोर दो-दो महाधिवक्ता। शशांक कुमार सिंह और अशोक सिन्हा दो-दो मुख्य सूचना आयुक्त।एक साथ अशोक सिन्हा और अभयानंद को मुख्य सचिव और डीजीपी। स्वर्गीय रामाश्रय सिंह, विजय चौधरी, ललन सिंह, पीके शाही रामानंद सिंह, अजीत कुमार, महाचंद्र सिंह ,अनिल कुमार, नीरज कुमार को जल संसाधन, ऊर्जा,शिक्षा, पथनिर्माण, परिवहन, पीएचईडी,संसदीय कार्य, साइंस टेक्नोलॉजी, सूचना प्रसारण,योजना जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय।महाचंद्र सिंह को तो 37 वर्षों के विधायकी जीवन मे पहली बार मंत्री नीतीश कुमार ने ही बनाया था।आज भी रामदयालु बाबु के बाद दूसरे भूमिहार विजय चौधरी विधानसभा अध्यक्ष हैं।शिशिर सिन्हा बीपीएससी के चेयरमैन हैं।लेकिन इसका मेसेज समाज में नहीं गया।
इतना कुछ करने के बाद भी जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग हुए तो उनको भूमिहार समाज का कोई वोट ही नहीं मिला बल्कि प्रचण्ड विरोध का भी सामना करना पड़ा।आज फिर बरमेश्वर मुखिया हत्याकांड की तरह अनंत प्रकरण में नीतीश कुमार बेवजह कोप भाजन किसी के कारण बन रहे हैं।उनको त्वरित डैमेज का कंट्रोल करना चाहिए और अनंत सिंह पर से UAPA धारा को हटाना चाहिए।

समाज के नौजवानों को भी किसी के विरोध में इतना आगे बढ़ने की जरूरत नहीं है जो आप किसी के हाथों की कठपुतली बन जाएं और केवल उपयोग की वस्तु बन कर रह जाएं।लालु विरोध में भी आपका उपयोग हुआ और नीतीश विरोध में भी उपयोग ही होगा।हम अपने को फिक्स क्यों करेंगे?जो जितना अधिक सम्मान देगा उसको वोट देंगे और समर्थन करेंगे। ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर ।
(लेखक के वॉल से साभार)