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महिलाओं के मत्थे 'दहेज' मत मढ़िये !

भूमंत्र में आजकल दहेज की कुप्रथा के खिलाफ हल्ला बोल अभियान चल रहा है।।इस कड़ी में आज दहेज उन्मूलन में महिलाओं की भूमिका पर विमर्श हो रहा है।। इस संदर्भ में शिक्षाविद कर्ण कुमार ने लिखा कि महिला ही सर्वाधिक दहेज के लिए एक महिला को प्रताड़ित करती है।।अगर घर में एक भी  महिला सदस्य दहेज उत्पीड़न के खिलाफ डटकर सामने आ जाएं तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि वह अपनी पत्नी / बहु/ भाभी  का उत्पीड़न कर सकता है।। इसपर चुटकी लेते हुए अधिवक़्ता संजीव कुमार ने लिखा कि और दहेज के सामान का लिस्ट महिलाएं बनाती हैं और उन के दबाव में पुरुष बार-बार घर से बाहर निकलकर एक-एक आइटम बढ़ाते रहते हैं।।

इन प्रतिक्रियाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए 'नूतन सिंह' ने सवालिए लहजे में लिखा - 


एक बात मुझे समझ में नहीं आती कि हर गलत काम के पिछे लोग महिलाओं को ही दोषी मानते हैं।चाहें वो घर का बँटवारा हो,दहेज की बात हो या महिला उत्पीड़न हो।मैं यह पूछना चाहती हूँ कि हर जगह जहाँ  महिलाओं से क्यों नहीं पूछकर काम करते हैं लेकिन जब दहेज लेने या भाई से बँटवारा करेगेँ तो पत्नी के कंधे पर बन्दूक रख कर चलाते हैं।वो चाहते हैं कि डिमांड औरतों की तरफ से हो और वो उसका पूरा समर्थन करते हैं।महिलाओं के मथ्थे मढ़कर दहेज अपने हाथ से लेते हैं।आपने देखा है दहेज का पैसा महिलाओं के हाथों में देते हुए...अगर घर का गार्जियन ठान ले कि दहेज नहीं लेना है..बेटा को बिना दहेज का शादी करने की छूट दें दो महिलाओं को क्या पड़ी है।इनके हिस्से में क्या मिलता है...  इसलिए पुरूषसत्तात्मक समाज में इनका ही सब कुछ चलता है।हम महिलाऐं तो सिर्फ इनका मोहरा है।
खा़स कर महिलाओं से मेरी प्रार्थना है कि..वो भी हर जग़ह महिलाओं को नहीं कोसे।


मैं मानती हूँ कि सदियों से महिलाओं को इतना दबा कर रखा गया है...जब कानून नहीं था महिलाओं के हक़ में..महिलाओं को नतो पिता की सम्पत्ति में अधिकार था न तो पति की सम्पत्ति में...उस समय जो विवाह के समय स्त्रियों को जो दान..दहेज मिलता था जो बेटी को ख़ुशी से दिया जाता था..वह स्त्रीधन होता था जो उसके..बुरे दिनों में काम आता था...जिस धन से स्त्रियों को ज्यादा मोह होता था।आज जो भी कुछ बजह महिलाओं में देखी जाती है उसका भी कारण यही है। हाँ ..कुछ जगह महिलाएं जिद्द पर अड़ जाती है तो उनको कैसे समझाना है यह उस घर के पुरूषों का काम है जैसे अन्य कार्यों में समझाते है..उस समय में तो महिलाएं बस इतना ही तक रह जाती हैं।बहुत तिरस्कृत अंदाज से बोलते है....औरत को नाक नहीं रहे तो.......

एक बात और जब लोग कहते हैं कि महिलाओं के ही करण दहेज है तो मुझे बतायें कि...जब अभिभावकों के हाथों में पैसा आ जाता है तो उस समय महिलाएँ यह कहते सुनी जाती हैं कि जेबर..गहना पूरा बना दीजिए ताकि भविष्य में लड़की को काम आये..पैसा बर्बाद मत कीजिए.. तब महिलाओं की बातों को नज़रअंदाज़ करके..आरकेस्ट्रा...विदेशी शराब,  डांसपाट्री,अगरम...बगरम...में पैसा बर्बाद कर देते हैं....तो दहेज लोभी औरत है या मर्द...हम औरतों के उपर लगे कलंक को मिटाना होगा...दोषी कोई हो बदनामी किसी को मिले।

Community Journalism With Courage

Comments

Pawan kumar said…
आप से पुर्णत: सहमत नहीं हूं। हां महिलाओं के साथ पुरुष भी दोषी हैं। परन्तु औरत ज्यादा दोषी हैं, इनसे इनकार करना संभव नहीं है । आपने लिखा है औरत को समझाने की जबावदेही पुरुष की है। परन्तु लाख समझाने के बाद औरत नहीं समझ नहीं सके तो क्या किया जा सकता है। हां ये भी सत्य है कि बहुत ही कम पुरुष हैं जो विल्कुल दहेज विरोधी हैं।अतः: पुरुष भी बराबर के दोषी हैं।

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