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माय लार्ड चारा घोटाले के सूत्रधार की सजा पर पुनर्विचार की जरुरत

fooder scam

न्यायिक सुधार अत्यावश्यक : समाजद्रष्टा सह स्वतंत्र राजनैतिक विश्लेषक एवं ब्रह्मऋषि चिंतक " राजीव कुमार " भारतीय कानूनी एवं न्यायिक व्यवस्था के और अधिक मजबूत , स्वच्छ , लोकप्रिय , न्यायप्रिय , जनहितैषी , पारदर्शी एवं सर्वग्राह्य बनाने पर जोर देने हेतु कानून सुधार की वकालत कर रहे हैं और उसकी आवश्यकता पर बल दे रहे हैं । 

चारा घोटाले में राँची की सीबीआई अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के बाद हर जगह माँग उठने शुरू हो गए हैं । कुछ प्रबुद्ध लोगों ने बड़े ही तर्कपूर्ण ढंग से और न्यायिक गरिमा के अनूकूल बड़ी ही शालीनता से एवं सदाचारपूर्वक इस फैसल पर अपने - अपने विचार सोशल मीडिया के माध्यम से रखे हैं और उनका इस न्यायादेश पर अपना विचार रखना एवं माँग करना हर कोण से न्यायसंगत एवं तर्कसंगत भी है । 

न्याय कहता है कि न्याय के तराजू पर सब एक हैं , न कोइ बड़ा और न कोइ छोटा । जब भी कोइ व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठा होता है तो उसकी एक ही जवाबदेही होती है कि उस कुर्सी की मर्यादा का सम्मान करें और ऐसा अद्भुत और तर्कसंगत न्यायादेश पारित करे जिससे किसी भी कोण से उस न्यायादेश पर किसी भी प्रकार की चुनौती की कोई गुंजाईश न हो और हर जगह उसकी कीर्ति फैले और उसका यशगान हो और यह न्यायादेश अपने आप में एक प्रतिमान हो । 

बहरहाल बात कानून की जब करते हैं तो ये कैसा कानून है जो किसी गरीब और आम आदमी द्वारा की गई 1000 की चोरी पर IPC की धारा 381 के तहत 7 साल की कैद का प्रावधान करता है जबकि PCA Act के अंतर्गत देश के खज़ाने से किये गए बहुत बड़ी राशि के गबन ( जो कि बहुत ही बड़ा और संगीन अपराध है ) के आरोपी को केवल 3 साल 6 महीने की सजा सुनाता है और वह भी यह जानकर कि वह आरोपी जनता के द्वारा जनता की सेवा करने के लिए भेजा गया एक महत्वपूर्ण ओहदे वाला व्यक्ति है । न्यायालय को ऐसे मामले में न्यायादेश सुनाने से पहले न्याय की गरिमा का बखूबी ख्याल रखना चाहिए था । खासकर इस बिंदु पर तो निश्चित रूप से सोंचना चाहिए था कि जिस आरोपी को महज साढ़े तीन साल की सजा सुनाई गई उस व्यक्ति ने अपराध करने और आरोप प्रमाणित हो जाने के बावजूद किस कदर इस पूरे प्रकरण पर न तो कभी अफ़सोस जताया और उलटे हर बार जमानत पर रिहाई के बाद ऐसी मनोदशा का परिचय दिया जो कोइ खतरनाक अपराधी भी संगीन से संगीन अपराध करने के बावजूद भी नहीं देता क्योंकि हर व्यक्ति के दिल में एक इंसान होता है जो उसको उसके द्वारा किये गए बुरे कृत्य पर सचेत करता रहता है । इसलिए ऐसे संगीन अपराध करने वाले अपराधी और इसकी हरकतों को न्यायालय को न्यायादेश सुनाते वक्त पूरा ख्याल रखना चाहिए था और उसका reflexion न्यायादेश में साफ दिखना चाहिए था । 

दुःख तो तब होता है जब इस पूरे प्रकरण के मुख्य गुनाहगार ( राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते ) को केवल साढ़े तीन साल एवं 5 लाख का जुर्माना और दूसरे अन्य अभियुक्त को 7 साल की सजा और 10 लाख का जुर्माना सुना दिया गया , जबकि वो आरोपी power और प्रभाव के मामले में इस मुख्य आरोपी ( जिसे केवल साढ़े तीन साल की सजा और 5 लाख का जुर्माना लगाया गया ) से कहीँ से भी उतनी प्रभावी भूमिका में नहीं थे या यूँ कहें कि कम थे । इसलिए न्यायादेश सुनाते वक्त सभी अभियुक्तों में जिनका ओहदा ज्यादा प्रभावशाली था उनको सजा सुनाते वक्त ज्यादा तर्कसंगत न्याय करना चाहिए था । 

कुलमिलाकर चारा घोटाले में आये इस फैसले पर ऊपरी अदालत को आगे की सुनवाई के दौरान पुनर्विचार करना चाहिए और इस कांड के सबसे मुख्य अभियुक्त जो बतौर मुख्यमंत्री सबसे प्रभावी भूमिका में थे उनको सर्वाधिक दंड सुनाया जाना चाहिए और सर्वाधिक जुर्माना भी उनसे ही वसूला जाना चाहिए एवं इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं मुख्य अभियुक्त के ( इस पूरे न्यायिक प्रक्रिया के दरम्यान ) आचरण एवं सामाजिक गतिविधि का भी ख्याल रखा जाना चाहिए ।
rajiv kumar
राजीव कुमार, ब्रहमऋषि चिंतक 

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