Skip to main content

अनंत सिंह बाढ़ से भू-पताका लहराएं तो मोकामा में झंझट खत्म हो जाएगा


सौरव सिंह -
◆मोकामा में कब तक ललन वर्सेज अनंत/एक स्वस्थ्य विचार

【आप सब से विनती से जयकारा ना लगाएं।।पूरा पढ़ें और अपना बहुमूल्य विचार जरूर रखें।।भूमिहार समाज जयकारा के लिए उत्पन नहीं लिया है।।】

आज कल मोकामा विधानसभा की चर्चा को मुख्यता देने के लिए हमारे BhuMantra की तारीफ ना करूँ तो ये नागवार लगेगा।।आज की तरीख में भूमिहार समाज के सबसे बेहतरीन ग्रुप में इसकी गिणती हो रही है।।शायद विधानसभा के विषय पर अभी से चर्चा करना ज्यादा न्योचित नहीं है।।लेकिन अगर आज अपने समाज की सबसे ज्यादा जरूरत है तो भूमिहार प्रतिनिधियों की कद्दावर और मजबूत प्रतिनिधियों की अधिक से अधिक संख्या बिहार विधानसभा के पटल में बढ़े।।वास्तविक रूप में अपने समाज के वरिष्ठ और सम्मानीय बुद्धिजीवियों को इसके ऊपर गहन रूप से चर्चा करनी चाहिए।।सभी अपने हैं फिर क्यों ना अपनों से अपनों के लिए पार्टी के लीक से हटकर एक बाह्य टीम बनाने पर जोड़ दिया जाए।।राजनीतिक दल कोई भी हो हमसब के समझौते के अनुसार सभी प्रतिनिधियों को समाज के एकीकरण को लेकर काम करने के लिए प्रेरित करना होगा।।

                                     रही बात हमसब के परशुराम की नगरी मोकामा की तो इस शीट पर आजादी के समय से ही विजेता, उपविजेता एवम सह उपविजेता सभी के सभी लगभग परशुराम के पुत्र ही रहे हैं।।तो क्यों ना इस तरह के शीट का चयन किया जाए जहाँ हमारा समाज तो चुनाव में अहम भूमिका निभाती ही है,लेकिन आजादी के वक्त से वहाँ दूसरे जाति के लोग ही चयनित होते आ रहे हैं।।इसी कड़ी में बाहुबली श्री Anant Singh जी को अपने गृह क्षेत्र बाढ़ की चर्चा किया जा सकता है।।जहाँ भूमिहार की काफी संख्या रहने के बाबजूद आजादी के बाद से राजपूतों का राज रहा है;हर तरह से बाढ़ विधानसभा में भूमिहार मतदाता अपना निर्णायक भूमिका निभाते आ रही है।।लेकिन अनंत सिंह जी का अपना घर आज तक भूमिहार विधायक के ख्वाब में मायूस रहती है।।

●मोकामा में एक और प्रतिनिधि  किसी जमाने के इंडियाज मोस्टवांटेड श्री Lalan Singh जी हैं,जिनके बारे में कहा जाता है कि अपने जान की बाजी लगाकर बारूद के ढेर पर बैठे अशांत मोकामा में शांति स्थापित करने में मुख्य भूमिका निभाया था।।किसी समय में प्रकाश शुक्ला जैसे कुख्यात अपराधी के गॉड फादर की भूमिका निर्बह्न करने वाले ललन सिंह खुद के अपराध की दुनिया मे अमूल चूक परिवर्तन लाये हैं।।हमारे जैसे युवा इस शख्सियत के बारे में इसी वजह से कुछ और नकारात्मक सोंच रखता था लेकिन परिस्थितियों के शिकार ललन सिंह जी की सोंच ने कई युवाओं को अपना सोंच बदलने को मजबूर कर दिया।।शिक्षित होने की वजह से मोकामा का पढा लिखा युवा का एक बड़ा खेमा शिक्षित प्रतिनिधि के चयन की खोज में इनको ही आज भी मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानती है।।निजी क्षेत्र में आरक्षण का हर मंच पर विरोध करने के उपरांत ललन सिंह इसकी लड़ाई लड़ने का भरोषा अपने समाज के युवाओ के दिलों में भर चुके है।।

●समाज को जोड़ने के लिए हर तरह के इंसान की जरूरत पड़ती है।।भूमिहार को एक मंच पर आकर एक दूसरे का मदद करना होगा।।आखिर कब तक हमसब एक दूसरे से लड़ेगे।।अगर अनन्त सिंह जी को अपने गृह क्षेत्र बाढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ने में संकोच होता है तो उनको मोकामा विधानसभा से भी लड़ने को स्वतंत्र कर दिया जाए।।लेकिन हाँ ये याद रखना है पार्टी कोई भी रहे उम्मीदवार हमारे समाज का ही होना चाहिए।।Bhumihar Mantra जी के द्वारा इस तरह के क्षेत्र का चयन अपने ग्रुप के स्तर से कर के उसका समुचित उपाय सामुहिक रूप से किया जाए।।

नोट:- यह एक स्वतंत्र भू विचार है,अगर आपको असुरक्षा की स्थिति लगती है तो आप अपना विचार जरूर रख सकते है।।

Comments

Unknown said…
सौरव बाबू,भूमिहारों की एकता के प्रयास लिए धन्यवाद! मेरे विचार से भूमिहारों में अगर आप की विचारधारा के भूमिहार होने लगे तो निश्चित रूप से बिहार की धारती पर भूमिहार का कोई मुकाबला ही नहीं है लेकिन विडंबना तो यह है कि हमारे समाज में आपकी तरह सोचने वाले बहुत कम हैं। मैं भागलपुर जिले के थानाबिहपुर का हुँ और मेरे बिहपुर विधानसभा में लगभग 75,000 वोटर भूमिहार जाति का है लेकिन लालू राज से यानि लगभग तीन दशक से अभी तक में मात्र एक बार 2010में भूमिहार जीता है जबकि भाजपा प्रत्यासी के रूप में भूमिहार हर बार चुनाव लड़ता है और मात्र 60,000 के आसपास ही वोट ला पाता है। भाजपा से लड़ने के कारण उन्हें अन्य जातियों का भी वोट मिलता है लेकिन 60,000 के आसपास ही वोट ला पाते हैं।इससे यह साबित होता है कि उन्हें अपनी जाति का जो 75,000वोट है वो भी पूरा नहीं मिल पाता है।यह बात तय है कि बिहपुर में जिस दिन भूमिहारों का वोट एकमुस्त हो जाएगा भूमिहार बिना किसी पार्टी से यानि निर्दलिय भी चुनाव जितेगा। भूमिहारों को एकजुट करने के लिए उन्हें आज के समय में भूमिहार की दयनीय स्थिती से अवगत कराना होगा।इसके लिए जरूरी है,स्वामी सहजानंद सरस्वती की तरह जमिनी स्तर पर संघर्ष।

Popular posts from this blog

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…

सेनारी नरसंहार को देख जब भगवान भी काँप गए,17 साल से बंद है मंदिर

मंदिर भगवान का घर होता है लेकिन उस मंदिर में जाकर कोई कुकृत्य करे तो भगवान भी नाराज़ हो जाते हैं और अपने द्वार बंद कर देते हैं. 
बिहार के अरवल जिले के सेनारी गांव में 17 साल पहले ऐसा ही हुआ जब मंदिर रक्तरंजित हो गया और उस घटना को देख भगवान भी एक बार काँप गए होंगे.लेकिन प्रभु से ये मासूम जिज्ञासा भी है कि अपने सामने ऐसा अनर्थ उन्होंने होने कैसे दिया? 
सेनारी में 17 साल पहले गाँव के इसी मंदिर में चुन-चुनकर 34 भू-किसानों की हत्या एक के बाद एक कर हुई थी. ह्त्या का तरीका भी बेहद निर्मम और दिल दहलाने वाला था. 
सभी 34 लोगों की हत्या गला रेत कर गाँव के मंदिर के द्वार पर की गयी थी. तब से आज तक उस मंदिर के द्वार बंद हैं. गांव के लोगों ने इस मंदिर में पूजा पाठ करना बंद कर दिया है. 
ग्रामीणों के मुताबिक भगवान के द्वार पर लोगों की हत्या कर दी गई है. लिहाजा मंदिर में पूजा करने का क्या फायदा ? अब पिछले 17 सालों में यह मंदिर वीरान पड़ा हुआ है.