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श्रीबाबू के बहाने बिहार में भूमिहारों की नयी सियासत

politics on the name of sribabu
पिछले तीन-चार सालों से बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की जयंती भूमिहार नेतृत्व पर एक दूसरे नेताओं द्वारा रस्साकशी से लेकर धावा बोलने तक पहुंच जाती है. इस बार यानी 21 अक्टूबर को भी श्रीकृष्ण सिंह की जयंती मनायी गयी और फिर वैसा ही हुआ. दरअसल बिहार की राजनीति पर लगभग आधी सदी तक वर्चस्व कायम रखने वाले भूमिहार समाज के नेता श्रीकृष्ण सिंह की लिगेसी के बहाने जहां अपने-अपने नेतृत्व को स्थापित करना चाहते हैं, वहीं वह अपनी-अपनी पार्टियों में अपना वर्चस्व भी स्थापित करना चाहते हैं. ऐसा करने से जहां उन्हें अपनी राजनीति चमकाने का लाभ मिलता है, वहीं दूसरी तरफ श्री बाबू के कद को नुकसान भी पहुंचता है. इसी का परिणाम है कि एक समय तक बिहार के नेता रहे श्री बाबू को उनके ही समाज ने भूमिहारों के नेता के दायरे में कैद करके रख दिया है.
बीते 21 अक्टूबर को श्री बाबू की जयंती पर दो संगठनों ने कार्यक्रम आयोजित किए. इसमें एक आयोजन कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह ने किया, जबकि दूसरा आयोजन पूर्व विधान पार्षद महाचंद्र प्रसाद सिंह ने किया. अखिलेश के आयोजन में लालू प्रसाद ने शिरकत की जबकि महाचंद्र प्रसाद के कार्यक्रम में भाजपा नेताओं की टीम जुटी. हिंदुस्तान अवामी मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी और मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद (बिहार भाजपा के नेता) और सुशील मोदी शामिल हुए. इन दोनों आयोजनों को अपनी-अपनी तरह से भूमिहार राजनीति के लिए ठौर तलाशने की मशक्कत के रूप में देखा गया. अखिलेश, कांग्रेस के नेता हैं और उनकी कोशिश है कि वह श्रीबाबू के नाम पर शक्ति प्रदर्शन कर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की दावेदारी पेश करें. वहीं पिछले दो सालों से बेघर हुए महाचंद्र सिंह भाजपा में, अपने कद की हैसियत से स्थान बनाना चाहते हैं. इन दोनों आयोजनों से किसे कितना लाभ पहुंचेगा, यह तो भविष्य में तय होगा लेकिन इन आयोजनों से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि, दशकों तक बिहार की राजनीति में अपना वर्चस्व व दबदबा कायम रखने वाला भूमिहार समाज आज नए सिरे से अपनी राजनीतिक जमीन की तलाश में है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इन दोनों आयोजनों में सीधे तौर पर ना तो कांग्रेस की भागीदारी थी और न ही भाजपा की.
हालांकि जहां तक भूमिहार समाज के वोटिंग पैटर्न की बात है, तो इस समाज की आम तौर पर या तो कांग्रेस के प्रति सहानुभूति रही है या फिर भाजपा की तरफ इसका झुकाव रहा है. आजादी के बाद से 1980 के दशक तक सत्ता शीर्ष पर रहे इस समाज ने, कुछ अपवादों को छोड़ कर, अपना दबदबा बनाए रखा. लगभग आधी सदी के इस दबदबे ने इस समाज में सत्ताधारी समाज होने की भावना भर दी. लेकिन 80 के दशक के बाद से इस समाज को पिछड़ों और दलितों से सीधी चुनौती मिलनी शुरू हो गयी. सत्ताधारी समाज होने की भावना से ओत-प्रोत इस समाज ने हर हाल में अपने वर्चस्व को बनाये रखने के प्रयास तो किये लेकिन 1990 तक आते-आते कांग्रेस के पतन के साथ भूमिहारों का राजनीतिक वर्चस्व भी डोलने लगा. यह वही दौर था जब बिहार में दलितों-पिछड़ों की तरफ से सामंतवाद के नाम पर संघर्ष परवान चढ़ने लगा. यह वही दौर था जब जाति के नाम पर अलग-अलग संगठन खूनी संघर्ष में उतर आए, जिसका परिणाम यह हुआ कि बिहार दर्जनों नरसंहार का गवाह बना. दलितों-पिछड़ों की नुमाइंदगी का दावा माओवादी संगठनों ने किया तो अगड़ों की तरफ से (विशेष कर भूमिहार समाज) रणवीर सेना जैसे संगठन सामने आये. तब एक तरफ सामाजिक वर्चस्व की लड़ाई अपने चरम पर पहुंच गयी तो दूसरी तरफ सत्ता की राजनीति में भी सामाजिक वर्चस्व की लड़ाई चरम पर पहुंच गयी. 1990 में लालू प्रसाद द्वारा बिहार की सत्ता पर कब्जा कर लेने और कांग्रेस की सत्ता से बेदखली के बाद भूमिहारों के लिए कांग्रेस के प्रति स्वाभाविक तौर पर आकर्षण भी कम हुआ.
उधर इस समाज ने लालू प्रसाद के नेतृत्व में अपने लिए न्यूनतम स्पेस पाया क्योंकि लालू प्रसाद जिन शक्तियों के खिलाफ संघर्ष करके सत्ता में आये थे उन शक्तियों की नुमाइंदगी भूमिहार ही कर रहे थे. बिहार में कांग्रेस के राजनीतिक पतन ने इस समाज को मजबूर किया कि वह कोई और विकल्प तलाशे. उधर भारतीय जनता पार्टी ने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में पेश करने की कामयाब कोशिश की. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर भूमिहारों के लिए भाजपा एक विकल्प के रूप में नजर आयी. यह वही दौर था जब कांग्रेस से शिफ्ट करके यह समाज भाजपा में उम्मीदें तलाशने लगा. और उसकी उम्मीदें काफी हद तक हकीकत में भी बदलीं. लेकिन भाजपा तब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के विकल्प के रूप में खुद को पेश करने की रणनीति पर काम कर रही थी. लिहाजा उसे अपना सामाजिक दायरा बढ़ाना जरूरी भी था और यह उसकी मजबूरी भी थी. जरूरी इसलिए, कि राजनीतिक रूप से ताकतवर होने के लिए उसे पिछड़ों और दलित समाज में भी स्पेस हासिल करना था और मजबूरी यह थी कि उस पर सवर्णों की पार्टी होने का ठप्पा लग रहा था. इन दो कारणों ने भाजपा को अपना विस्तार पिछड़ी जातियों में करने के लिए प्रेरित किया. पर यह तभी संभव था जब संगठन में पिछड़ों दलितों को जगह मिलती. स्वाभाविक तौर पर इसकी कीमत सवर्णों को, खास कर भूमिहारों को चुकानी थी. 1990 के बाद भाजपा ने लालू प्रसाद के वर्चस्व को चुनौती देने की रणनीति के तहत नंदकिशोर यादव को प्रदेश अध्यक्ष बनाया. उधर अन्य पिछड़ी जातियों की नुमाइंदगी करने वाले सुशील मोदी ने पहले ही भाजपा में सशक्त बन कर उभरने का अवसर प्राप्त कर लिया था. वह विरोधी दल के नेता बनाये जा चुके थे. भाजपा में पिछड़ी जातियों के बढ़ते वर्चस्व का नुकसान आम तौर पर सवर्णों और खास तौर पर भूमिहारों को होना ही था, जो हुआ.
इस बीच लालू प्रसाद की सत्ता से पकड़ी ढीली होने लगी और उन्हें मजबूरन कांग्रेस से हाथ मिलाना पड़ा. उसी कांग्रेस से जिसे हरा कर उन्होंने सत्ता पर कब्जा जमाया था. कांग्रेस के सत्ता सहयोगी बनने पर हालांकि भूमिहारों को आंशिक लाभ ही हुआ. इस बीच 2005 आते-आते लालू प्रसाद की सत्ता से बेदखली हुई और इसके लिए नीतीश कुमार ने जो रणनीति अपनाई उसके तहत लालू से नाराज भूमिहार नेताओं का उन्होंने साथ लिया. इस प्रकार जब भाजपा के सहयोग से जब नीतीश की सरकार बनी तो सवर्णों में सबसे बड़ी भागीदारी भूमिहारों को तो मिली पर नेतृत्व के स्तर पर उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ. इस तरह जदयू का नेतृत्व यादव( शरद यादव) और कुर्मी( नीतीश कुमार) के हाथों में था. दूसरी तरफ जदयू की सत्ता सहयोगी भाजपा के नेता सुशील मोदी और अन्य पिछड़े नेताओं के हाथ में था, जहां अन्य भूमिहार नेताओं के लिए तमाम गुंजाइश के बावजूद विकल्प सीमित थे.
ऐसे में अनेक भूमिहार नेताओं ने अपने समाज में जातीय चेतना भरने की रणनीति अपनाई ताकि सत्ता में हिस्सेदारी के लिए अपने समाज को गोलबंद किया जा सके. यह वही रणनीति थी जिसे इससे पहले अन्य पिछड़ी जातियां सत्ता में हिस्सेदारी के लिए अपनाती रही हैं. सन 2000 से भूमिहारों के अंदर जातीय चेतना को उत्प्रेरित कर राजनीतिक रसूख प्रदर्शित करने का चलन खूब बढ़ा है और इसके लिए बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इधर भाजपा के दिवंगत नेता कैलाशपति मिश्र के नाम पर भी आयोजन होने लगे हैं. इन आयोजनों को करने के लिए आम तौर पर किसी राजनीतिक दल के बैनर का इस्तेमाल नहीं करने के पीछे असल कारण यह है कि आयोजन कर्ता राजनीतिक दलों को अपनी शक्ति दिखा सकें. ऐसे में इन संगठनों के नेता राजनीतिक दलों पर निशाना साधने और कुछ दलों को भूमिहार विरोधी होने तक का आरोप लगाने से नहीं चूकते. पिछले वर्ष कैलाशपति मिश्र की पुण्यतिथि 3 नवम्बर को आयोजित की गयी थी. स्वाभाविक तौर पर इस वर्ष भी यह आयोजन होना है. लेकिन पिछले वर्ष की पुण्यतिथि पर भाजपा के बेगूसराय के सांसद और वरिष्ठ नेता भोला सिंह ने जो भाषण दिया वह भाजपा के लिए काफी सरदर्द बढ़ाने वाला था. भोला सिंह ने खुद अपनी पार्टी को चुनौती देते हुए तब कहा था कि भाजपा भूमिहार को पोसुआ (पाला हुआ) न समझे. हम कैलाशपति मिश्र की औलाद हैं. हमारे पास कलम भी है, तलवार भी है. श्री सिंह ने कहा था कि पार्टी के लिए हम मरते-खपते हैं. लाभ का मौका आता है तो कहा जाता है कि आप अलग रहिए.
बिहार में जातीय राजनीति का अपना मर्म है. दर्जनों पिछड़ी जातियां सियासी हकूक पाने के लिए जातीय चेतना को जागृत कर निशाना साधती हैं. अब यह चलन अगड़ी जातियों में भी बढ़ रहा है. भूमिहारों के अलावा ब्राह्मण और राजपूत भी ऐसे प्रयोग करने लगे हैं. इस तरह के प्रयोग से राजनीतिक हित सधता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सवर्णों द्वारा जातीय गोलबंदी के आधार पर सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई का कमजोर पक्ष यह है कि जब दर्जनों पिछड़ी जातीय अपने सियासी हक की बात करती हैं तो उनके पास यह आंकड़ा होता है कि सत्ता में हिस्सेदारी जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए. जबकि तथ्य यह प्रमाणित करते हैं कि सवर्णों की सत्ता में हिस्सेदारी उनकी आबादी के अनुपात से अब भी ज्यादा है. (चौथी दुनिया से साभार)

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