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एक राजा जो गरीबों के लिए फकीर बन गया - राजनारायण

गरीबों के मसीहा राजनारायण की पुण्यतिथि पर विशेष

rajnarayan
राजनारायण
राजेंद्र राय, समाजवादी चिंतक- 
गरीबों के मसीहा - 20वीं शताब्दी के लोक बंधु, उम्र 69 साल, जेल 80 बार, लोकनायक राजनारायण का जन्म अक्षय नवमी को 1917 में, उत्तर प्रदेश के उस जमींदार परिवार में हुआ था, जिसका संबंध काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह के राजघराने से जुड़ा माना जाता था. बहुतायत में जमीने, रसूख और रूतबा पर वह अलग मिट्टी के बने थे. समाजवाद में तपे और ढले हुए राजनारायण जी पर परिवार के नौकरों-चाकरों, गांव के गरीबों, कामगारों, मजदूरों, दलितों और पिछड़ों को हक दिलाने का ऐसा जुनून सवार था कि उन्होंने अपने हिस्से की सारी जमीन गरीबों को दान दे दी. परिवार में विरोध हुआ. भाइयों ने बुरा माना, पर वे टस से मस नहीं हुए. यहां तक कि अपने बेटों के लिए भी कोई संपत्ति नहीं रखी. 

संघर्ष की प्रतिमूर्ति - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अपने छात्र जीवन से ही वह एक छात्र नेता के रूप में संपूर्ण उत्तर प्रदेश में जाने जाते थे. 'संघर्ष हमारा नारा है, यही हमारा सहारा है' उनकी जुबान पर छात्र जीवन से ही यह उद‍्घोष के रूप में निकलता रहता था. 1934 में जब सोशलिस्ट पार्टी बनी तब डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण आदि नेताओं के साथ वे भी संस्थापकों में थे. तभी से वे समाजवादी पार्टी के कार्यक्रमों के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे. आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन इत्यादि की गोष्ठियां कराने में वह अग्रणी रहते थे. 

अन्याय और जातिवाद के खिलाफ आजीवन जंग - समता, बंधुत्व और सद‍्भाव की प्रतिमूर्ति राजनारायण ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमए, एलएलबी की डिग्री प्राप्त करने के बाद वाराणसी कोर्ट में वकालत प्रारंभ की, पर स्वभाव से फक्कड़, जन्मजात समाजवादी को भला धनअर्जन कहां पसंद आता. भारत मां की बेड़ियां उन्हें नागवार लगती थी और भारत माता को स्वतंत्र कराने के जज्बे ने उन्हें अनेक बार जेल की हवा खिलाई. देखते ही देखते वे प्रमुख समाजवादी चिंतक एवं समाजवाद के मजबूत स्तंभ बन गये. उन्होंने डॉ. लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की. वह पार्टी के साधारण सदस्य से राष्ट्रीय अध्यक्ष तक प्राय: सभी महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हुए, परंतु सदैव अपने आपको आम आदमी बनाये रखा. सन‍् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दरम्यान वे भारतीय छात्र कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. उनकी राजनैतिक सक्रियता ने उन्हें 5000 का इनामी इंसान बना दिया, जिसे अंगरेज जिंदा या मुर्दा पकड़ना चाहते थे. वह 1942 से 1947 तक (आजादी मिलने तक) कई बार जेल गये, परंतु कभी भी विचलित नहीं हुए. समाज में फैले अनाचार, जातिवाद और अन्याय के खिलाफ उन्होंने अनेक लड़ाइयां लड़ीं. समाज की भलाई उनके राजनैतिक जीवन का प्रेरणास्रोत थी. अनगिनत दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं उपेक्षितों को राजनीति में पद प्रतिष्ठित करने का काम उन्होंने किया. 

विपक्ष की आवाज़ - लगभग 40 वर्षों के संसदीय जीवन में राजनारायण हमेशा विपक्ष की मजबूत आवाज बने रहे. 1952 से 1962 तक वह दो बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा के सदस्य रहे. 1969 में जिन समाजवादियों को लगता था कि इंदिरा गांधी को हराना मुश्किल है उन्हें 1971 के चुनावों में इंदिरा गांधी के खिलाफ एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में राज नारायण का चुनाव करना पड़ा. इनकी राजनीतिक समझ ही थी कि जहां चंद्रभान गुप्ता और चंद्रशेखर जैसे नेताओं की हिम्मत नहीं हुई इंदिरा गांधी के खिलाफ लड़ने की, वहां पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया. वे मजबूती से लड़े पर इंदिरा गांधी के असंवैधानिक तरीकों ने उन्हें हरवा दिया. वे अदालत गये, आखिरकार पांच साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया. इंदिरा गांधी की जीत अवैध घोषित कर दी गयी और उनके छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गयी. 12 जून 1975 को फैसला आते ही इंदिरा गांधी ने देशभर में आपातकाल लागू कर दिया. आपातकाल लगने के कुछ ही घंटों के अंदर सबसे पहले राजनारायण जी की ही गिरफ्तारी हुई. उसी दिन जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अटल बिहारी वाजपेयी की भी गिरफ्तारी हुई. यकीनन राजनारायण वो शख्स थे, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी को बुरी तरह आतंकित कर दिया था और उनके जीवट भरे कारनामों की बदौलत ही आजाद भारत में पहली बार विपक्ष को सत्ता में आने का मौका दिया. उन्होंने 1977 में रायबरेली से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हारते ही स्वतंत्र भारत का राजनैतिक इतिहास बदल दिया. वे 1966 से 1976 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. 1977 से 1980 तक केंद्रीय मंत्री रहे. ऐसा कहा जाता है कि रामविलास पासवान सहित तीन दलित नेताओं को वे खुद टिकट देने विमान से उनके पास गये. 

फकीर की भांति जीवन यापन - 31 दिसंबर 1986 को इस महामानव का निधन हुआ, लेकिन केवल 69 वर्ष की आयु जी कर इस भारतीय राजनीति के योद्धा ने लोकतांत्रिक मूल्यों की वह लकीर खींची, जो आज भी राजनीतिज्ञों के लिए लक्ष्मण रेखा बनी हुई है. अपने अंतिम दिनों में राजनैतिक हलाहल पीते-पीते उनकी तबियत अस्वस्थ रहने लगी थी, पर उन्होंने स्वाभिमान के साथ कभी समझौता नहीं किया. राजनारायण जी फकीर की भांति जीवन यापन करते रहे. उनके व्यक्तित्व में एक ही साथ भगवान परशुराम और चाणक्य के दर्शन होते थे. संसद के दोनों सदनों से लेकर सड़क के आम आदमी तक राजनीति करने वाले ऐसे व्यक्तित्व पर भारत सरकार ने डाक टिकट जारी करके अपना कर्तव्य निर्वाह तो किया है, परंतु इस राष्ट्रीय नेता का कोई उचित स्मारक नहीं बन पाना हमारा राजनैतिक और सामाजिक दिवालियापन है. अपने कार्यकर्ताओं को पिता का प्यार देने वाले इस राजनेता के दिल्ली निवास पर आम और खास सबके लिए एक समान प्रबंध करने वाले व्यक्तित्व के लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा एवं अन्यत्र दिये गये भाषणों का संकलन न होना राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है. जिस व्यक्ति ने संपूर्ण राष्ट्र की स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई का नेतृत्व किया, उपेक्षितों और शोषितों को न्याय दिलाते रहे, कभी किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखी, उस व्यक्ति के आदर्शों को प्रतिष्ठित करने के लिए उनका कोई शिष्य या अनुयायी आगे नहीं आया, यह दुर्भाग्य है. भारतीय राजनैतिक इतिहास के पृष्ठों में सदैव उनका नाम अमर रहेगा. (प्रभात खबर से साभार)

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