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वैवाहिक विवाद और भूमिहार समाज के संगठनों की मजबूरियां

उदय कुमार शर्मा -

दो पीढ़ियों का टकराव - 

बच्चा जबतक छोटा है तभी तक वह आपके साथ, आपके लिए, आपके पदचिन्हों पर, आपके बताये संस्कारों को लेकर चलता है। उस समय आपको भी और उसे खुब सुख भी मिलता है जब तक वह आत्मनिर्भर नहीं हो जाए !! लेकिन आपकी आत्मनिर्भरता से बच्चा जैसे ही बाहर निकलता है और बाहर की दुनिया में खुद के अस्तित्व देखता है, फिर महसूस करता है और समझता है कि वह घर से मिले पहले के सभी संस्कार, आचरण और अनुभवों को धिरे धिरे छोड़ते हुए /रखते हुए आगे बढ़ रहा है ऐसे में ही अब उसका अपना व्यक्तित्व /अस्तित्व की पहचान होने लगती है। और इस प्रकार मन ही मन में पहले चरण के अनुभव को आज के परिवेश में जो महसूस हो रहा है उन दोनों के बीच तुलना करता है और उस तुलनात्मक स्थिति को एक नाम देता है " Generation Gap " और यही वह शब्द है जहाँ उसे बड़ा होने का और बिना अविभावकों के सही गलत फैसले लेने का अधिकार दे देता है। अब उसके हर गलत सही फैसले में 10-20 फीसदी परिवार का और 80 फीसदी उसके अच्छे बुरे मित्रों का सहयोग / समर्थन रहता है जिसमें घर की रीति रिवाज,परंपरा, स्वभाव और संस्कार की अहमियत भी उसी औसत से रहती है। ऐसे में ज्वलंत प्रश्न बन के उभरा है कि बच्चे को आधुनिक शिक्षा के साथ साथ अपने परंपराओं का अहसास कराते हुए संस्कारित कैसे रखा जाए ????

समाज, परिवार और वैवाहिक विवाद - 

मित्रों विवाह एक ऐसा विषय बन गया है कि आज के वातावरण में युवा पीढ़ी शिक्षा को ध्यान में रखते हुए, देह और देहयष्टी को ध्यान में रखते हुए, कपड़े पहनने के तरीके को ध्यान में रखते हुए, बोल चाल की भाषा को ध्यान में रखते अपना पति /पत्नि पसंद करता है। (बहुत कुछ को छोड़ दें तो) ऐसे में उनकी प्राथमिकता परिवार और परिवार का रहन सहन कम मायने रखता है बल्कि उनकी निजी पसंद और नापसंद प्राथमिकता में आ गया है। नतीजा आए दिन अच्छे से लेकर सामान्य घरों में बहुत ज्यादा या थोड़ा कम विवाहोपरांत समस्या आने लगी है। जाहिर सी बात है कि परिवार का दम घुटने लगा है जबकि विवाह के बाद परिवार के हाथ में विकल्प खासकर समाजिक दायरे में शुन्य है। ऐसे में हम फिर दूसरे विकल्पों के तरफ पांव बढाने लगते हैं जो परिवार के लिए आजीवन कलंक, दाग, और उपहास का पात्र तो बनाता ही है दूसरे समाज में कौतूहल का विषय भी बना देता है।

संगठन के पास सुझाव तो हो सकता है समाधान नहीं - 

बीते 6-8 माह में कई सूचनाएं /समस्याएँ मिली कि मुझे मुआवजा दिलाने में मदद किजिये, विपक्ष को जेल में बंद कराने में मदद किजिये, और तो और चार दिन पहले एक मैसेज मिला कि मेरी शादी अपाहिज लडके के साथ कर दी गई है और अब मेरा दम घुट रहा है इसलिए मुझे कोई इमानदार वरिष्ठ पुलिस से मुलाकात करा दिजिये !!! मै हतप्रभ था फिर भी उनसे पूछा कि ऐसा कैसे हुआ बताने लगी की मेरे फादर बेड रिडेन हैं जिससे जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पाए और लड़का अपनी विकलांगता को छुपाए रखा। मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकती। ऐसे में संगठन के पास सुझाव तो हो सकता है समाधान सीमित है। मित्रों इस दूश्चिंता का शिकार आज अपना समाज भी बूरी तरह से हो रहा है।आए दिन दिखाई दे रहा है कि हम विकास कर रहे हैं लेकिन बहुत कुछ खो देने के बाद बल्कि जितना हम विकास कर रहे हैं बल्कि उससे ज्यादा ह्रास कर ले रहे हैं। यही वह मन की चिंता है /मन का गांठ है या कहें कि खुलते हुए समाज में अनिक्षा से समझौता है। जिसे समझने की महत्ती आवश्यकता है। यह बात बहुत दिनों से आप सभी के समक्ष शेयर करना चाहता था लेकिन समाजिक शर्म, संकोच और उधेड़बुन में करीब 7 या 8 माह बीत गए। तब निश्चय किया है कि इन बातों को गंभीर और अनुभवी मित्रों के साथ शेयर किया जाए और कोई हल निकालने का प्रयास /प्रयोग किया जाए।

सामाजिक कमिटी जो बंद कमरे में बातचीत कर मामला सुलझाए -  

मैं चाहता हूँ कि मुख्य मुख्य शहरों में या छोटे छोटे कस्बों में एक कमीटी बनाई जाए जहाँ ऐसे मामले के लिए अपने समाज की नीःशुल्क दो महिला वकिल, दो पुरुष वकिल और दो समाज के गंभीर व अनुभवी प्रतिनिधि तथा साथ में संबंधित परिवार के साथ दो चार सदस्य एक बंद कमरे में राउंड टेवल पर बैठकर (तर्क वितर्क नहीं ) बल्कि आहत मन को, पसंद नापसंद को, अपेक्षा उपेक्षा को, भविष्य की चिंताओं को अपना बेटा बेटी की तरह समझते हुए पूरे यथास्थिति और परिवेश को भलीभांति समझें , फिर स्वयं महसूस करें कि यदि मेरी बेटी और मेरा दामाद इन परिस्थितियों में हो तो कैसे कैसे सवाल जवाब करता, या जवाब देता या महसूस करता, यदि ऐसा महसूस करते हुए सभी लोग बातों को करेंगे तो मन की गांठ खुलेगी और लोग चिंताओं के बोझ से बाहर निकल कर सारी मतभेद और मनभेद को सामने रख पाएंगे। जिससे मुझे लगता है कि दम घुंटते परिवार में फिर से नई शुवह की ताजी किरणें प्रवेश कर सकती है और परिवार के साथ साथ समाज की सार्थकता समझ में आ सकती है। और नहीं तो बुद्धिजीवी वर्ग, पढ़ा लिखा वर्ग, साथ में गौरवशाली भूमिहार ब्राह्मण परिवार का सदस्य कहलाने का कोई नैतिक हक नहीं है। क्योंकि जब हम अपने घरों की समस्या दूर नहीं कर सकते हैं तो दूनिया का चौधरी बनने की बात करनी बेमानी है। आवश्यकता है इस प्रक्रिया को अपनाया जाए और समाज भी इस तरह के ( बीच बचाव ) के अवधारणाओं को स्वीकार करे, वह भी पूरे सम्मान के साथ । तभी समाधान संभव है नहीं तो दोनों पक्ष कोर्ट और कचहरी में दूश्मनी को बढाते रहेंगे और अन्य समाज के लिए कौतूहल बनते रहेंगे। इस लिए विश्वास करें और मानकर चले की यही अंतिम विकल्प है। इसके लिए पहली आवश्यकता है कि समाज के लोग अपने अपने विचार दें, इससे बढ़िया कोई और तरिका बताएँ, जिसमें स्थान, सदस्यों की संख्या, उसपर आने वाले खर्च और कहीं आने जाने की सूविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी बातों को रखें।

संगठन उतना मजबूत नहीं जितना होना चाहिए - 

मित्रों अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासंघ एक पंजीकृत संगठन हैं जिसके अध्यक्ष श्री मनीष कुमार शेखर हैं और मैं महासचिव हूँ। लेकिन कई कारणों से संगठन उतना मजबूत नहीं है जितना होना चाहिए था क्योंकि उसके लिए धन और सदस्यता की कमी है। जिसके चलते संगठन में आने वाली अपनी ही समाजिक समस्याओं का समाधान बहुत कम हो पाता है। फिर भी प्रयास रहता है कि जितना संभव हो सके लोगों के साथ खड़े रहें। लेकिन दूर में जब लोगों को पता चलता है कि अपने समाज का दिल्ली में संगठन है तो जाहिर सी बात है अपेक्षाएं होंगी और चाहेंगे कि हमारे समस्याओं का समाधान हो। हमने देखा कि लोग बिल्कुल जेन्यून समस्याओं को प्रेषित करते हैं लेकिन जब मेरे द्वारा यह बताया जाता है कि आपकी समस्या का समाधान संगठन के स्तर से होना संभव नहीं है तो लोगों का मन छोटा हो जाता है। दुःख तो संगठन के साथ साथ हम सभी को होता है क्योंकि कि समाज या व्यक्तिगत रूप से कोई प्रताड़ित हो रहा है और हम धन की कमी के कारण उस स्तर का प्रयास नहीं कर पाते हैं तो स्वभाविक है कि दुःख होगा। जिसके लिए संगठन की ओर से निवेदन भी करते हैं कि आईए मजबूत संगठन की छांव में समाजिक समस्याओं का समाधान करें। मित्रों, पिछले 6-8 महीने में वैवाहिक जीवन की 4 शिकायतें मेरे पास आई और मेरे पास सुझाव तो है लेकिन समाधान नहीं है।क्योंकि अपने को ठीक और दूसरे को गलत बताने से तो बात बनती नहीं इसके लिए तो दोनों पक्ष के बीच बैठकर संवाद की आवश्यकता है इसलिए परिवार प्रताड़ना का शिकार बन रहा है समाज चुपचाप देख रहा है या अपनी अपनी बारी का इंतजार कर रहा है कि जब होगा तब देखेंगे। और फिर इसी तरह भड़ास निकाल कर शांत हो जाता है। लेकिन जिस तरह से अपने समाज के कुछ अ-गंभिर युवाओं ने इस समस्या को जन्म दिया है उसका प्रभाव समाज के अन्य युवाओं पर नहीं पड़ेगा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। इस लिए इन बातों को गहराई से समझने /विचारने के बाद इस विषय को आप जैसे गंभीर मित्रों के साथ शेयर कर रहा हूँ कि आगे आईए और समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश किजिये।सामुहिक प्रयास अभी हमने शुरू भी नहीं किया है इसलिए इसकी सफलता पर संदेह का कोई कारण नहीं दिखाई देता। कृपया अपनी राय वे ही देवें जो इस गंभीर समस्या को समझने का दम रखते हैं।  
(लेखक के सोशल मीडिया प्रोफाइल से साभार)

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