Skip to main content

वामपंथियों के सामने राष्ट्रवादी क्यों पिछड़ते हैं?

चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह- 
communist vs nationalist
पिछले 100 सालों से पूरी दुनिया की बौद्धिकता पर वामपंथ हावी रहा है जिसके मूल में सत्य-विरोधी नैरेटिव है जो नैतिकता के छद्मावरण में पेश होता है और एक की विफलता के लिए दूसरे की सफलता को जिम्मेदार बताकर पूरे समाज में काहिली को बढ़ावा देता है। इस तरह वह निजी उद्यम को नीची निगाह से देखता है और अंततः धनोपार्जक को उत्पीड़क तथा निर्धन को पीड़ित साबित कर ख़ुद को पीड़ित की आवाज़ घोषित कर देता है। 
 ●मनोविज्ञान बनाम अर्थशास्त्र 
इस लिहाज से वामपंथ का अर्थशास्त्र से कम मनोविज्ञान से ज़्यादा गहरा रिश्ता है।कौन नहीं चाहेगा कि उसकी असफलताओं के लिए किसी और को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए? राष्ट्रवादी इस वामपंथी छद्मावरण को डिकोड नहीं कर पाने के चलते वामी तर्कजाल में अक्सर उलझ जाते हैं। पूरे यूरोप-अमेरिका का यही हाल है। आज स्थिति यह है कि भारत समेत यूरोप-अमेरिका के ज्यादातर देशों में चुनावी जीत चाहे किसी भी पार्टी की हो, वैचारिक जीत वामियों की ही होती है। 

 ●वामपंथ और इस्लाम 
 उपरोक्त संदर्भ में वामपंथ के बीज इस्लाम में छिपे दिख जाते हैं क्योंकि वहाँ भी मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या काफ़िर (ग़ैरमुसलमान) हैं और काफ़िरों को जेहाद के द्वारा मुसलमान बनाना या मिटा देना ही उनका सबसे पाक उद्देश्य है। इस प्रक्रिया में काफ़िरों की ज़र-जोरू-ज़मीन पर कब्ज़ा करना वैसे ही हलाल है जैसे वामपंथ में ख़ूनी क्रान्ति द्वारा धनी लोगों की लूट और उनका सफ़ाया वाजिब है।लेकिन दोनों की पोलखोल उनके सत्ता में आने के बाद व्यवस्थाजनित विफलता से होती है। इस विफलता की जड़ में है मनुष्य की बेहतर संभावनाओं को कुचल कर उसे राज्याश्रित या किताबाश्रित बना दिया जाना जिसके बाद वह निजी उद्यम से ज्यादा लूट-खसोट को अपनी राह के रूप में चुनता है। सोवियत संघ का पतन, चीन का पूँजीवाद की राह पकड़ना और इस्लामी देशों के कलह इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। 

 ●एक मानसिक बीमारी 
अपनी विफलता के लिए दूसरे की सफलता को जिम्मेदार ठहराकर ख़ुद को पीड़ित-दमित घोषित करने को अगर आधार-दृष्टि मान लिया जाए तो साम्यवाद-इस्लाम-जातिवाद आदि एक मानसिक बीमारी के सिवा कुछ भी नहीं जिनका ईलाज असंभव सा है क्योंकि इस बीमारी का जो शिकार होता है उसे अपनी बीमारी के बने रहने में ही अपना हित नज़र आता है। मतलब यह भी कि सोये हुये को तो जगाया जा सकता है, लेकिन सोने का नाटक करनेवाले को कैसे जगाया जाए? अगर लोकतंत्र में ऐसे सोने का नाटक करनेवाले बहुमत में आ गए तो वे इस नाटक को ही असली और असल जीवन के धर्म(कार्य-व्यापार, कर्त्तव्य) को नकली घोषित करने में सफल हो जाएँगे। ऐसा ख़तरा आज पूरी दुनिया पर मँडरा रहा है। 

 ●कट्टरता के स्रोत:
अज्ञान, धूर्तता, परमज्ञानअक्सर लोग यह कहते सुने जाते हैं वामपंथी या इस्लामवादी अपने उद्देश्य के प्रति इतने कट्टर होते हैं कि उनपर विश्वास सा होने लगता है। यहाँ यह सहज सवाल उठता है कि इस कट्टरता का स्रोत क्या है? कट्टरता के मूल स्रोत तीन ही होते हैं:अज्ञान, धूर्तता या फिर परमज्ञान।वामपंथ और इस्लाम का परमज्ञान से नाता इसलिए नहीं हो सकता कि परमज्ञान सर्वग्राही और समावेशी होगा, वह 'माले मुफ़्त दिले बेरहम' के सिद्धान्त पर टिका नहीं हो सकता। इसके बाद नंबर आता है अज्ञान और धूर्तता का। वामपंथ और इस्लाम दोनों के शीर्षस्थ और दार्शनिक स्तर पर तो धूर्तता ही प्रमुख है क्योंकि यह मानना मुश्किल है कि मूल विचार के प्रतिपादकों को जीवन और समाज की असलियत नहीं पता होती। लेकिन निचले स्तर पर लोगों को ऐसे दृष्टिगत पेंचोखम से परिचय नहीं होता और वे सीधे-सीधे इसे अपने तात्कालिक स्वार्थ या हित से जोड़कर देखते हैं। मतलब कट्टरता की जड़ में है आम लोगों का अज्ञान और ख़ास लोगों की धूर्तता।हाँ, यह बात जरूर है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के कारण अब इस वामी-इस्लामी छद्मावरण और नाटक की पोल खुलने लगी है।(लेखक इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में मीडिया शिक्षण का कार्य कर रहे हैं. @एफबी )

Community Journalism With Courage

Comments

Popular posts from this blog

अंतर्जातीय विवाह की त्रासदी सुहैब इलियासी-अंजू मर्डर केस, सच्चाई जानेंगे तो चौंक जायेंगे

पत्नी अंजू की हत्या के मामले में सुहैब इलियासी दोषी,मिली उम्रकैद की सजा  खुलेपन के नाम पर अंतर्जातीय विवाह आम बात है. भूमिहार समाज भी इससे अछूता नहीं. लड़के और लड़कियां आधुनिकीकरण के नाम पर धर्म और जाति की दीवार को गिराकर अंतर्जातीय विवाह कर रहे हैं. लेकिन नासमझी और हड़बड़ी में की गयी ऐसी शादियों का हश्र कई बार बहुत भयानक होता है. उसी की बानगी पेश करता है अंजू मर्डर केस जिसमें 17साल के बाद कोर्ट का फैसला आया है और अंजू के पति सुहैब इलियासी को उम्र कैद की सजा का हुक्म कोर्ट ने दिया है. गौरतलब है कि अंजू इलियासी कभी अंजू सिंह हुआ करती थी और एक प्रतिष्ठित भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती थी.
सुहैब इलियासी और अंजू की कहानी - अंजू की मां रुकमा सिंह के मुताबिक़ सुहैब और अंजू की पहली मुलाकात 1989 में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई थी. धीरे-धीरे दोनों अच्छे दोस्त बन गए और बात शादी तक जा पहुंची. अंजू के पिता डॉ. केपी सिंह को जब इस रिश्ते का पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया. लेकिन इसके बावजूद अंजू और सुहैब ने 1993 में लंदन जाकर स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी कर ली. इसके बाद अं…

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…