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भूमिहार आरक्षण आंदोलन की प्रासंगिकता पर राजीव कुमार का चिंतन

भूमिहार आरक्षण आंदोलन की प्रासंगिकता पर सवाल उठा रहे हैं ब्रम्हर्षि चिंतक राजीव कुमार 

bhumihar aarkshan aandolan
ब्रम्हर्षि चिंतक राजीव कुमार की नज़रों में भूमिहार आरक्षण आंदोलन और इसके नफा नुकसान
आज जब समूचा देश एक अजीबो गरीब स्थिति से जूझ रहा है जहाँ एक तरफ भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी अपने चरम पर है वहीँ देश का अन्नदाता किसान लगातार जीवन मरण जैसी स्थिति से जूझ रहा है । किसानों की दुर्दशा का आलम यह है कि अनेकों प्रान्त में बहुतेरे किसानों ने आत्महत्या तक कर लिया लेकिन आज के संवेदनहीन राजनेताओं के मन मस्तिष्क पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और सबके सब अपने राजशाही ठाट बाट में मगन हैं । किसी को देश और देश की जनता की कोई परवाह नहीं है । आज के समय देश की राजनैतिक स्थिति एवं परिस्थिति इस प्रकार हो चली है कि जो एक पुराने कहावत को पूर्णतया चरितार्थ करने वाली है " अंधेर नगरी चौपट राजा , टके सेर भांजी टके सेर खाजा " । 

बात भूमिहार समाज में हो रहे चंद सामाजिक एवं राजनैतिक घटनाक्रम पर करते हैं जहाँ एक बार फिर से चंद लोगों द्वारा अपने निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिये राजनीतिक सम्मलेन का आयोजन एक नियमित अंतराल पर करने का सघन अभियान चलाया जा रहा है और समाज के युवाओं को आंदोलित कर उनको अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति हेतु इस्तेमाल करने का प्रयास किया जा जा रहा है ।इन पूरे राजनैतिक सम्मेलनों पर गौर करने पर इनके करता धर्ता की मंशा पर प्रश्न उठाना इसलिए भी लाजिमी हो जाता है क्योंकि किसी भी सम्मलेन में समाज और राष्ट्र की मूल समस्याओं जिसमें मूल रूप से बेरोजगारी , किसानों की समस्या और भ्रष्टाचार है , उसपर किसी भी प्रकार की चर्चा या परिचर्चा न तो की जाती है और न ही किसी प्रकार के आंदोलन में इन मूलभूत समस्याओं को आधार बनाया जाता है । 

कुल मिलाकर केवल और केवल युवाओं को गुमराह कर उनमें जातीय उन्माद को पैदा कर अपने व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति हेतु प्रयास किया जाता है ।सचमुच कितना दिशाविहीन और उद्देश्य विहीन हो चला है हमारा समाज कि राज काज चलाने के लिए सबसे आवश्यक सामाजिक चिंतन और मनन करना ही भूल गया है । समूचा देश भ्रष्टाचार और संवेदनहीन और व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति में आकंठ डूब चूका है । किसी भी वर्तमान राजनेता को देश की मूलभूत समस्याओं से कुछ भी लेना देना नहीं है । चारों तरफ जात पात की राजनीति को फैलाकर केवल सत्ता हासिल कर राज करने का एक छद्म प्रयास चल रहा है । 

सत्ता से धन और धन से सत्ता , बस यही खेल चल रहा है जिसने समूचे लोकतंत्र का माखौल बनाकर रख दिया है और एक तरह से लोकतंत्र की आड़ में अप्रत्यक्ष राजतन्त्र को चलाने का प्रयास चल रहा है । आज जहाँ समूचे देश में प्रतिभा की हत्या करने वाली जातिगत आरक्षण को खत्म करने की बात और इसके लिए उग्र आंदोलन होनी चाहिए और गरीबी को दूर करने एवं गरीबों को संरक्षण हेतु आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई व्यवस्था लागू होनी चाहिए ताकि देश से गरीबी पाटने का हमारा संकल्प पूरा हो सके । लेकिन इसके ठीक उलट गुजरात में पाटीदार आरक्षण और बिहार में भूमिहार आरक्षण की बात उठाकर एक सुनियोजित रणनीति के तहत कुछ आरक्षित श्रेणी के पहले से स्थापित जातिगत क्षत्रपों ने अपने राजनैतिक दुकानदारी को बचाने का एक नायाब तरीका अपनाया है और एक नया जाल बुना है जिससे उनकी राजनैतिक दुकानदारी चलती रहे क्योंकि वो भली भांति जानते हैं कि न तो गुजरात में पाटीदार और न ही बिहार में भूमिहार को आरक्षण मिलने वाला है । उनका मकसद साफ है कि इन दो आंदोलनों के माध्यम से जातिगत आरक्षण के वर्तमान प्रारूप का बचाव करना और इसके सहारे खुद राजनैतिक मसीहा बन अधिक से अधिक समय तक राज करना । 

वो भली भांति जानते हैं कि यदि वर्तमान जातिगत आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण जैसे ही लागू किया जाएगा वैसे ही उन आरक्षित श्रेणी के पहले से जमे - जमाए जातिगत क्षत्रपों की राजनीतिक दुकान बंद हो जाएगी क्योंकि आर्थिक आरक्षण के लागू होते ही उनके ही जाति के गरीब लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण पाकर राजनीति एवं अन्य क्षेत्र में आगे आएंगे और तब इन जमे जमाए राजनीतिक क्षत्रपों का वजूद खत्म हो जाएगा । इसलिए बिहार का भूमिहार आरक्षण आंदोलन और गुजरात का पाटीदार आरक्षण आंदोलन भी इन आरक्षित श्रेणि के पहले से पूर्णतया स्थापित जातिगत क्षत्रपों को बचाने के लिए इनके ही द्वारा प्रायोजित एक कदम मात्र है ।वास्तव में इन आंदोलनों से इस समाज का कुछ भी भला होने वाला नहीं है ।

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