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श्रीबाबू के मंच पर लालू यादव की बैठने की हैसियत नहीं

उदय कुमार शर्मा-

संदर्भ - श्रीबाबू के मंच पर लालू यादव

मित्रों, भू मंत्रा के प्रश्न के सापेक्ष में, यह बिल्कुल सत्य है कि 90 के दशक के पूर्व का इतिहास में ऐसा कोई वाक्या नहीं है या कोई उदाहरण नहीं है कि भूमिहार ब्राह्मणों से अहिरों के बीच दुश्मनी का भाव रहा है। हम सभी अहिरों द्वारा किये गये खेतों में कार्य पर दलितों से ज्यादा भरोसा करते थे। लालू ने अपने राजनीति में भूमिहार ब्राह्मण के कुछ नेताओं से मित्रवत व्यवहार भी रखा लेकिन जब लालू ने जगन्नाथ मिश्रा को राजनीति के चौसर पर पटकनी देना शुरू किया तो मिश्रा ने ही भूमिहार ब्राह्मण नेताओं को आगे कर लालू के लिए कांटे बोए और यही वह Turning Point है जब अहिरों के मन मस्तिष्क पर भूमिहार ब्राह्मणों की दूश्मनी छा गई । यह भी सत्य है कि उस समय की राजनीति को भूमिहार ब्राह्मण नेताओं ने बिना समझे, वोट प्रतिशत का बिना आंकलन किए,समाज को बिना संगठित किए लालू विरोध की राजनीति की धुरी बन गये। जबकि लालू को याचक ब्राह्मणों, राजपूतों एवं लालाओं ने विरोध तो किया लेकिन दूशमनी के भाव से नहीं। और यही भूमिहार ब्राह्मण नेताओं से चुक हुई की जमी जमाई राजनीति से हम बाहर हो गए ।

 खैर!!! न अब घाव बदल सकता है और न भाव। इस लिए आज के परिवेश में अखिलेश सिंह द्वारा बिगड़ी को बनाने का प्रयास जो किया जा रहा है उसका आदर तो दूर की बात है शरणात मानी जाएगी। इसलिए मेरी समझ यही है कि जो रेखाएं खिंच दी गई उसे मिटाने का प्रयास हमारी राजनीति को कहीं का रहने नहीं देगा। यह ठीक है कि अनंत सिंह भूमिहार ब्राह्मण का नेता नहीं है और यह भी सत्य है कि अनंत सिंह पढा लिखा भूमिहार ब्राह्मण नेता नहीं मान सकता लेकिन जिस तरह से केवल भूमिहार ब्राह्मण होने के कारण अनंत सिंह को जलील किया गया है उसके पीछे क्या लालू नहीं था??? जबकि अनंत सिंह उस घटना में नहीं पडते तो भूमिहार ब्राह्मणों को डुब मरने के लिए भी पानी नहीं मिलता। और यही कारण था कि पूरा समाज अनंत सिंह के साथ किए गए राजनीतिक दुर्व्यवहार के लालू को कभी माफ नहीं करेगा।
रही बात श्री बाबू की जयंती पर समारोह में शामिल होने के लिए आने की तो समारोह में कोई भी आ सकता है उसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन समारोह में शामिल होना और अपनी घपले घोटाले की राजनीति में फंस जाने के बाद स्वीकार्यता बनाने में जमीन आसमान का अंतर है जिसे ध्यान में रखते हुए इसे गंभीरता से लेना होगा।

अखिलेश सिंह का क्या है हम सभी जानते हैं ये महोदय उस दिन भी लालू के साथ थे जब लालू के इशारे पर भूमिहार ब्राह्मण के घरों में घुसकर सामूहिक नरसंहार किया जा रहा था। उस समय अगर मुखिया जी परशुराम की भूमिका में नहीं आते तो.......... सभी को याद है ही न!! कि राबड़ी ने विधानसभा के पटल पर ललकारते हुए कहा था कि जो लोग हमे वोट नहीं देते हैं उनके यहाँ मातम पुर्सी करने नहीं जाएंगे। 

ऐसे में सवाल उठता है कि वह कौन सी स्थिति आ गयी है कि लालू को लाने के लिए अखिलेश सिंह ने सोंच लिया ???? और उससे भी ज्यादा सोंचने वाली बात है कि वह कौन सी स्थिति आ गयी जिसमें लालू हमारे मंच पर आ रहा है ???

मित्रों जहां तक मै समझता हूँ कि घपले घोटाले में फंसे लालू को, मोदी के द्वारा किए गए बांस ने लालू को, पूरा परिवार को अबतक के सबसे बड़े घोटाले में फंसे लालू को, माई समीकरण का टुटे हुए अंदेशे ने लालू को अंदर से हिला दिया है। क्योंकि जब पूरा परिवार जब अंदर जाएगा तो RJD में बर्चस्व की लड़ाई होगी ही होगी। इसलिए राजनीतिक दलदल में फंसा हुआ लालू समारोह में शामिल होने के लिए तैयार हैं। आखिर डुबते को तिनका भी सहारा दिखाई देता है।

और अंतिम में एक सलाह....... कि वह समारोह में आ रहा है तो दर्शकों के बीच बैठे क्यों कि मंच पर बैठने की औकात अब उसकी नहीं रही क्यों कि अगले चुनाव के पहले तेजस्वी भी नौलखा बिल्डिंग का पहरेदार बन चुका रहेगा। इस लिए दूश्मन को दूश्मन के स्थान पर ही रखिए!! नहीं तो दूश्मन को मित्र के स्थान पर बैठाकर जो भी बची खुची राजनीति है उसकी भी ऐसी तैसी करा लेंगे।

(उदय कुमार शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार)
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