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नक्सलवाद के मौलिक दर्शन पर सर्जिकल स्ट्राइक : भाग 1

बाबू अंबुज शर्मा
{अराजकतावादी वामपंथी शासनतंत्र बनाम  सनातन भारतीय व्यवस्था} ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~                 क्या है अराजकतावाद ???? 
ज्ञात हो कि पश्चिमी वाम पंथ विभिन्न मतों का संकलन है यथा माक्स का मार्क्सवाद , लेनिन का लेनिनवाद , प्लूटो , हेराक्लिटिस ,हेलूमूसयस आदि के मत । इसी क्रम मे एक मत है अराजकतावाद {anarchism}।

यह राजनीति विज्ञान की वह विचारधारा है जिसमें राज्य की उपस्थिति को अनावश्यक माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी तरह की सरकार अवांछनीय है। इसमें साधारणतः यह तर्क दिया जाता है कि मनुष्य मूलतः विवेकशील, निष्कपट और न्यायपरायण प्राणी है। अतः यदि समाज सही ढंग से संगठित हो तो किसी प्रकार के बल प्रयोग की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। ऐसी स्थिति में राज्य की उपस्थिति स्वतः अप्रासंगिक हो जायगी।

विचारधारा के प्रवर्तक 

माइकेल बाकुनिन {१८१४-१८७६}
प्रिंस क्रोपोट्किन( १८४२- १९११)

अराजकतावाद की प्रमुख मान्यतायें 
१. धर्म और राज्य की मानव को आवश्कता नही , पूर्ण स्वतंत्रा उसका अधिकार है।
२. मानव को सभ्यता और विकासवाद के पथ पर आपसी सहयोग के साथ बढना चाहिए।
३. राज्य निरंकुशता का प्रतीक है ।
४. कोई मनुष्य दूसरे का प्रतिनिधित्व नही कर सकता । मनुष्य अपना प्रतिनिधित्व केवल स्वयं कर सकता है अतैव शासन मे प्रतिनिधि की प्रधानता स्वीकार्य नही।
५.निर्वाचन द्वारा जनता की सामाम्य इच्छायें तक व्यक्त न हो पाती और निर्वाचन के बाद सता का मद तो आ ही जाता है 
(खैर इसे तो सनातन संत आयार्य तुलसीदास भी स्वीकारते हैं - 
                 प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ।) 

६ बिना राज्य के स्वेच्छात्मक संस्थाओं द्वारा काम चल सकता है।
७. जेल पाखण्ड और कायरता के स्मारक हैं ,दण्ड के भय से प्राणी अपराध न करेगा ये समझना राज्य की सब से बडी भूल है।
७. धर्म मीठी गोली है और राज्य पाखण्ड।

अराजकतावादी व्यवस्था की संरचनात्मक पहलू-- 
१. क्रान्ति के पहले अराजकतावादी शिक्षा का प्रसार आवश्यक है ।
२. वैज्ञानिक तर्को द्वारा जनता के मन मे अराजाकतावाद कूट कूट के भर देना चाहिए ।
३. नागरिक के हैसियत से राज्य से , उत्पादक की हैसियत से पूँजीवाद से तथा मनुष्य की हैसियत से शासन मात्र से स्वतंत्रता अराजकतावाद का ध्येय है।
४ अराजकतावाद पूर्ण स्वतंत्रता का युग है ।
{ Kiss of Love आदि के नाम पर जे एन यू मे इसी थ्योरी का implementation आप देख रहे)
५ जो स्वस्थ और योग्य होगा काम करेगा । २४ से ५० वर्ष की अवस्था काम करने की होगी।प्रतिदिन ४ से ५ घण्टे काम बिना वेतन और प्रोत्साहन के ।
६ उत्पाद की वस्तुये पहले बच्चे बूढे विकलांगों को फिर अन्य को वितरित की जयेंगी ।
७ संघटन के लिए छोटे छोटे प्रादेशिक संघ होंगे , जजल्मों प्रत्यक्षजनवादी प्रबंध होगा {नक्सल जन अदालत के रूप मे इसक़ा implementationआप भारत मे देख सकते है ) ।इनसे प्रान्तिय से देश समीतियां बनेगी । देश से यूरोप को और यूरोप से विश्व को प्रतिनिधि भेजे जायेंगे { ८० _ ९० के दशक मे मगध मे इस सोच वामपंथ और नक्सलिज़्म का प्रसार करने वाला डा विनियन किसका प्रतिनिधि था शायद समझ आ रहा होगा ।) 
८ समस्या आने पर अस्थाई संघ का निर्माण होगा और विशेषज्ञ भेजे जायेंगे , युद्ध की स्थिति मे भी ।
९ समसस्या खत्म समीति खत्म।
१० समाज के बिना स्वतंत्रता से शोषण और अन्याय बढता है तथा समाजवाद से स्वतंत्रता के बिना दासता और पशुता ।

इस संपूर्ण अराजकतावादी मत पर  पहले मैं सनातन मत की श्रेेष्ठता सिद्ध करता हूँ फिर अगले अंक में वामपंथ के आड मे वैश्विक स्तर पर खेले जा रहे रक्तरंजित अर्थ{ Money power etc} का रहस्योद्घाटन करूंगा।

जिसका नाम ही अराजकतावाद है वो अराजकता की ही सृष्टि करेगा न? इस से समाज मे मत्स्यन्याय फैलेगा और मनुष्य पशुप्राय हो जाएगा ।
यह थ्योरी तभी संभव है जब वैश्किक जनसंख्या  कम हो एक गांव जितना और सारे नागरिक सात्विक तत्वेता जितेन्द्रिय और धर्मनिष्ठ  हो अर्थात् व्यक्तिगत चरित्र निर्माण आवश्यक जिसका इस सिद्धान्त मे कही कोई स्थान न है।
इस पूरे सिद्धान्त का practical implementation महाभारतकाल मे कर के नकारा जा चुका हैं जिसकी पुष्टि  महाभारत राज्यधर्म के 

   ।।न वै राज्यं न राजासीत् ।।

 वाक्य से होती है।

इस से सिद्ध है कि मूल तत्व चरित्र निर्माण है जो धर्म का ही स्वरूप है क्योंकि

धारयति इति धर्मः ।

जिसे धारण किया जाता वही धर्म है।

धारण किसे करते गुण को ।
गुण धारण किये बिना चरित्र निर्माण संभव नही अतैव ये सिद्धान्त गलत है।

यही नही इस व्यवस्था पर रामायण काल मे भी विचार किया गया जिसे महर्षि वाल्मीकि ने अक्षरशः निरस्त किया अपने तर्को से ।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के ६७ वें खण्ड में अराजकता की दुरवस्था का व्यापक वर्णन है _ 

नाराजके जानपदे विद्युन्माली महास्वनः।
अभिवर्षति पर्जन्यो महीं डिंयेन वारिणा।।
नाराजके  जनपदे बीजमुष्टिः प्रकीर्यते ।
नाराजके पितु: पुत्रो भार्या वा वर्तते वशे।।
अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके ।
इदमत्याहितं चान्यत्कुतः सत्यमराजके ।।
नाराजके जनपदे कारयन्ति सभां नरा:।
उद्यानानि च रम्याणि हृष्टाः पुण्यगृहाणि च ।।

इसी प्रकार महर्षि वाल्मीकि अनेक स्थानो पर अराजकतावाद का खण्डन करते हैं ।

मैं हिन्दी नही लिखा क्योंकि लेख बडा और ऊबाउ हो जाएगा जो समझ न पायें refrence पर जा ववस्तार से पढे फिर भी कुछ सवाल तर्क सुझाव हो तो सादर स्वीकार है ।

एक तरफ अराजकतावादी प्रतिनिधि का खंडन करते दूसरे तरफ यूरोप का प्रतिनिधि विश्व मे भेजने की वकालत करते ये कैसा दोगलापन है ?

सोचे और स्वविवेक से निर्णय ले अगले खण्ड में इस मुद्दे को और विस्तार दूंगा।
।।प्रणाम ।।

        लेखक
  बाबू अम्बुज शर्मा 
    ( मगध पुत्र )
।।जय जय महाकाल ।।

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