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कराहता भूमिहार और माखौल उडाती दुनिया !

-बाबू अंबुज शर्मा-
अंबुज शर्मा
आज बिहार मे सर्वत्र भूमिहारो को दरकिनार करने की होड़ चल रही है।लोग राजनीति से लेकर आम जीवन तक में इस जाति विशेष से दूरी बनाए रखना चाहती है । आखिर क्यो?कारण क्या है आखिर?

भारतवर्ष मे काल और स्थान पर शासक राजवंश बदलते रहे पर नही बदला तो वो था मुख्यधारा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ भूमिहार। एक ऐसी प्रजाति जिसके इर्द गिर्द सूक्ष्म रूप से कृषि आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था शुरू से कमोबेस आज तक घूमती आयी  है।जनता मे पैठ और जमीन से जुडे रहना हमारी खासियत रही है। मिट्टी की सेवा और भारत पर जान न्यौछावर करने का जज्बा शुरू से रहा है। अन्याय के विरूद्ध  आवाज उठाना हमारी फितरत। किसी की राह पर न चल खुद नई राह बनाना हमारी आदत।फिर भी आज हम हाशिए पर क्यो और कैसे? विरोधियो की चाल को समझने की जरूरत है। 

झूठा शान और दंभ

धीरे धीरे कर के हमारे पिछलग्गु भीतरघाती शत्रु जो शुरू से हमारे टुकडो पर पलते आए  मालिक मालिक कर के हमारे बच्चो के मन मस्तिष्क मे झूठा घमण्ड भरते गये और आज इतना दंभी और अहंकारी हो चुका है ये समाज की इसे अपने लिए खोदा गया कुआं भी प्रशंसा की गूंज लगते है।अरे कुल कलंको जागो वरना अस्तित्व मिट जाएगा ।आज सोच समझकर हमारी मूल ताकत पर प्रहार किया जा रहा है एक एक कर के।आम जनता से भूमिहार समाज का अलगाव इसका उदाहरण है।

आज कोई भी ये नही जानता मंगल पाण्डे, फतेह बहादुरशाही, पेशवा बाजीराव, स्वामी सहजानंद, सर गणेश दत्त, श्रीकृष्ण सिह आदि भूमिहार थे. पर ये जरूर जानता है कि ब्रह्मेश्वर नाथ, अनंत सिह, सूरजभान सिह ,विवेका पहलवान आदि भूमिहार है।क्यो? क्योकि हम इसे अपना यशगान समझते और वो जनता के सामने हमारे इन चेहरो को समाजद्रोही के रूप मे प्रस्तुत करते।
भाड मिडिया राजनेता और कम्युनिष्ट गला फाडफाडकर मेन बरसिम्हा बाथे और मियापुर पर भूमिहार समाज को कोसते है पर बारा मिर्जापुर रामपुर सेनारी चौरम आदि पर सब के सब अंधे। यकीन न हो गूगल मे नरसंहार बिहार डाल के देखो सब जगह केवल बारा और बथानी टोला की चर्चा और भूमिहारो को देशद्रोही के रूप मे दिखाया गया मिलेगा पर कही भी सेनारी आदि का जिक्र न मिलेगा। गर कही छोटा सा आर्टिकल मिल भी गया तो उसमे लिखा मिलेगा* एक खास जाति के लोगो की हत्या* कही भूमिहार शब्द का जिक्र न मिलेगा। आखिर क्यो?और हमारे युवा इसे अपनी ताकत समझ पीठ थपथपा लेगे या दूसरा अपने समाज का ही एक पक्ष होगा जो अपने नब्बे के दशक के पूर्वजो को अत्याचारी समझ गाली देता मिलेगा। ये समझने की कोशिश न करेगे की ये सब क्यो हुआ ?
आखिर भारत की पश्चिमी सीमा की हिफाजत दौ सौ से अधिक वर्ष तक करने वाला शाही वंश (भूमिहार) अंग्रेजो के खिलाफ सबसे पहले बिगूल फूंकने वाला फतेह बहादुर शाही (शकरवार भूमिहार' रेवतीपुर यू पी ),मुगलो को औकात बताने वाले पेशवा बाजीराव (चितपावन भूमिहार महाराष्ट्र ),अंग्रेजो को सबसे पहले गोली दागने वाले मंगल पाण्डे ( भूमिहार ), जमींदारी उन्मूलन के प्रणेता स्वामी सहजानंद ( भूमिहार ) आदि  राष्ट्र और समाज पर सर्वस्व न्यौछावर करने वालो की जाति आखिर नरसंहार पर क्यो आमदा हुई?
  
वास्तव मे ये  जंग विचारो की है माओवाद बनाम राष्ट्रवाद। पर ये वैचारिक जंग नक्सलवारी पश्चिम बंगाल से खूनी जंग बनना तब शुरू हुआ जब माओ विचारधारा के कुछ लोगो ने नक्सल दस्ता बना जमींदारो पर धावा बोलना शुरू किया। पडोसी राज्य बंगाल से कुछ बिहारी मजदूर भी दिग्भ्रमित हुए पर बिहार मे जमीन्दार थे भूमिहार, राजपूत और सैय्यद।
शुरूआत मे भूमिहारो के जनता मे पैठ के चलते वो इस जाति से दूर रहे पर सैय्यद और राजपूतो पर इनका कहर जमकर टूटा। परिणामस्वरूप उन्होने प्रतिकार के लिए सनलाईट आर्मी बनाई। तो उधर छोटे किसानो यादवो ने लोरिक सेना बना ली। नक्सल की मुख्य धूरी थे कोयरी।पर पुख्ता विरोध न होने से नक्सलियो के हौसले बढने लगे और उन्होने अब भूमिहार कायस्थ और ब्राह्मणो को भी परेशान करने लगे।
पर क्यो?
आखिर हमसे उनकी क्या दुश्मनी थी? 
बंगाल से ये बिहार मे क्यो कूच कर गये?

ये वो दौर था जब बिहार की राजनीति से भूमिहार राजपूत और ब्राह्मणो का पकड कम होता जा रहा था और नये शक्ति के रूप मे यादवो का प्रादुर्भाव हुआ था. परिवारवादी लालू के नेतृत्व के  रास्ते मे सबसे बडा रोडा था भूमिहार समाज।
सोची समझी साजिश जो दूरगामी परिणाम देनेवाला था खेल दिया गया । हर तरफ से हमला। समाज के नेतृत्व करने वाले हमारे समाज के प्रबुद्ध लोगो को एक एक कर मरवा दिया गया और जिनके कंधे पर बैठकर हम खेत घूमते जिन्हे चाचा कह जिनकी अंगुली पकड चलना सीखे बेचारे भोले भाले हमारे मजदुरो को हमारे ही विरूद्ध भडका दिया गया। राष्ट्रवाद की थाती भूमिहार समाज माओवाद के जकडन मे घूटन महसूस करने लगा तब प्रादुर्भाव हुआ रणवीर सेना का।
हमे गर्व है कि हम बिहार से माओवादिओ को खदेडने मे कामयाब रहे पर बदले मे बहुत बडी कीमत देनी पडी। गांव के गांव उजड गये। हमारे अपने ही मजदूर हमारे विरोधी हो गये।हमारे अजीज कामगार हाथ बिहार छोड दूसरे राज्यो मे पलायन कर गये। हमारे युवा झूठे केस मे फंसा दिए गये और अधिकत्तर जमीने केस लडने मे बिक गयी। शिक्षा व्यवस्था चरमरा गयी।हमारे युवा कलम से कम बंदुक से अधिक नाता जोडने लगे।इतना सब त्याग के बाद भी सारा दोष हमारे मत्थे मढ दिया गया।

आज हर भूमिहार ताजा सर्वे के हिसाब से औसतन डेढ लाख रूपये कर्ज के नीचे दबा है।अपने भविष्य अपने बच्चो को पढाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने पर तुला है फिर भी आरक्षण का मार उसी पर। और कुछ भूमिहार युवा पढाई और समाजिक उत्थान को छोड परशुराम जयन्ती के दिन मार्च निकालने की वकालत करते है तो उन्हे बता दू कि मुह बंद कर के शक्ति संवर्धन करो।बेमतलब उर्जा बर्बाद करने के बजाए ऐसा काम करो जिससे गरीब बाभनो की स्थिति मे सुधार हो।

आपलोग अपना ख्याल रखे।

लेखक
।।बाबू अंबुज शर्मा।।
।।मगधपुत्र।।
।।जय जय महाकाल।।

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Comments

Mauli bhardwaj said…
Kuch sacchi ye bhi hai ki 1990 k daur me bihar me congress k kamjor hone k baad bihar ki rajneeti me yadavo k uday hua aur ussi daur me lp shahi congress leader k bete hemant shahi ka uday hua unhone bhumihar samaj se hue rajnetik bhul jo congress ko chhor hamara samaj bjp aur janta party gathbandhit sarkar ko jitaya aur satta yadavo ke haath me chali gayi uska ahsaas karana chaha aur bhumihar samaj ko phir se yaad karana chaha tha lakin afsos ki hemant shahi maare gaye aur bhumihar samaj apni galti nahi sudhaar paya,agar hemant shahi jinda hote to kya hota? Lalu 15 saal tak raj nahi ker paata aur yadav jati rajneetik taur pe itna majboot nahi ho paati,aur congress bihar me phir se majboot ho jata aur sayad hemant shahi bihar k CM bante aur bihar kabhi itna nahi picchrta
Mauli bhardwaj said…
Jitna bhi tanav hua dharmik tanav,jatiae tanav,iss sab ki wajah hai jis wajah se ranveer sena bani,,bhumiharo aur swarno pe attyachar ki wajah se,, iss sab ki wajah itna hi tha ki satta yogya ke haath se aayogya k haath me chali gayi aur jatiwaad ko vote bank k aadhar mante hue satta ka sanchalan suru ker diya gaya aur iska subse jyada prabhab bihar aur up pe pada jo aaj tak congress ki sarkar dubara nahi ban saki,iss baat ko samajhna hoga

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