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धराशायी होती भूमिहार अस्मिता, बाबू अंबुज शर्मा की कविता

कलिकाल लाल कराल भाल 
पर महाकाल ताण्डव कर रहे
लड लड के भिडकर संग मे
भूमिहार संकट  सह रहे

नर नारी धेनू वाहन निशि दिन
यादवा-आतंक की बलि चढ रहे
आपसी मतभेद मे नित नये ऋण
ऋषिकुल के बाभनो पर बढ रहे 

है वृहद हृदय विशाल सहज स्वभाव बाभन जात का
हा मिल गये गर आज फिर देगे जवाब ये हर बात का
हो गरीब या सुपुष्ट अमीर या हो अपंग-अनाथ का
आज है दरकार हमे एक दूसरे से विश्वस्त साथ का

सम्प्रति बवंडर लाने की रखते है क्षमता सभी 
युद्ध मे बुद्दि हमारी  होती न है  असफल कभी
कर तैयारी संग्राम की ब्रहर्षि कस कटि अब शान से
 फिर कुछ ऐसा हो कि मस्तक उठा रहे अभिमान से
डरते रहे युगो तक सब शत्रु भार्गवनंदनो  के नाम से
हो सुशोभित जग पुनः हमारे विषद अनुपम ज्ञान से 

एक घटना कह रहा हू नयी सुनो ध्यान से
कुकर्मी चढ गये बहुसंख्या मे एक गांव पे
भृगुनंदनिया तन गयी देख खतरा आन पे
अंत तक लडी सब था मान प्यारा जान से 

आततायी जुल्मियो ने तब किया ऐसा  दारूण काम रे
माताओ के जबडे तोडकर लिखाया कायरो मे नाम रे

पर शूर वीरपुत्रो की जुबां क्यो अबी तक मौन है?
घरनियो के अपमान पर भी क्यो पौरूष गौण है?
क्या हो चुका है रक्त पानी माता सती के पूत का?
या जटा शाखा जड बढ गयी है आतंक झूठ का?
क्या शरीर शिथिल हुआ है ब्राह्मण भूप का
या भुजाए कट चूकि आयाचक ब्रह्मदूत का

मै नही पुकारता उस पुरूषत्वहीन समाज को
मै दे रहा आवाज हूं सम्मानित नूतन आज को
कर पुनः हुंकार तुम झंकार एक विराट् हो 
कर शंखनाद तू तेरी भृकुटि तनी ललाट हो

भूप नृप देव दनुज मनुज या चराचर का झुण्ड हो
यक्ष नाग किन्नर राक्षस या गिरी शिखर तुंग हो
डमगाये धरनी डोले अंबर डोले,डोले ये सारी अवनी
कांप जाए दुष्टो की जननी थर्राए उन गंवारो की गृहणी
जागो जागो जागो दौडो हे शावको तेरी माता है शेरणी
अंग प्रत्यंग मे बिजली फिर दौडे ऊष्ण तेरी हो  धमनी
फूटो हे दुर्वासा टूटो झपटो हे पातक त्राता
रणक्षेत्र मे विहारो संहारो संहारो हे भ्राता

मुण्ड काटहू विकट विकराल भट सब
अब भूल यज्ञ मे खुद को समर्पित  किजिए
 गर हुई पूर्णाहुति इस द्यूति मे तब
गर्व से अभिमान से सम्मान से जी लिजिए

वीर ही इस धरा पर भोगते है सदा राज रे
कायरो को तो होता है अपयशो पर नाज रे

कहत अंबुज तुम्हे नूतन समाज बनाइए
विजित जगत मे पुनः नया सृजन कराइए

आगे और भी है------

नोट :
कायर नपुंसक दूर रहे।
ताकि जग देखे कि गर ऐसा ही चलता रहा तो हम क्या कर सकते है।

मै किसी जाति या धर्म विशेष का विरोधी या समर्थक नही हूं । मै अंधी जातिव्यवस्था जो अंग्रेजो की देन है और संप्रदायवाद जो नेताओ की देन है के नाम पर हो रहे आतंक का प्रबल विरोधी हूं।

मै बताते चलू मेरे हठयोग के गुरू एक राजपूत है प्रोफेशनल गुरू एक यादव मेरे निकटवर्ती मित्रो मे मुस्लिम भी है यादव भी राजपूत भी ।और हम मे से अधिकतर के साथ ऐसा ही है शायद।
किन्तु जो जाति के नाम पर छद्म यादवो ने किया वो अनैतिक था और उसका मै पुरजोर विरोध करता हू । उन्होने कृष्ण को नही माना उनके सिद्धान्त नही माने पर हम मानते है जो जैसे समझे उसे वैसे ही समझाओ।

शठम् शाठ्ये समाचरेत्।

।।हर हर महाकाल।।

।।मगध पुत्र ।।
।।बाबू अंबुज शर्मा।।

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