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देखिए अरुण जी कैसे कुशवाहा समाज के जगदेव प्रसाद की जयंती मनाने से नहीं चूकते उपेन्द्र कुशवाहा

हर समाज के अलग-अलग नायक होते हैं.ये जरुरी नहीं कि आपके नायक को भी दूसरा नायक माने.ऐसे में उस समाज का कर्तव्य होता है कि वे अपने नायक के नायकत्व को संजो के रखे और पूरे दुनिया में उसका प्रचार-प्रसार करता रहे. इसी नीयत से सभा-संगोष्ठी, जयंती आदि मनायी जाती है. इस मामले में समाज के नेताओं की भूमिका अग्रणी होती है. लेकिन जब वे ही अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए तो समाज और उसके नायक के सामने बड़ी संकटप्रद और हास्यास्पद स्थिति पैदा हो जाती है. 

हाल में भूमिहार ब्राह्मण समाज के सामने कुछ ऐसी ही स्थिति पैदा हुई जब किसान नेता ब्रह्मेश्वर मुखिया की पांचवी पुण्यतिथि शहादत दिवस के रूप में मनायी गयी. इस मौके पर पटना में हर साल की तरह इस बार भी एक भव्य कार्यक्रम मनाया गया. भूमंत्र के आह्वाहन पर दिल्ली के इंडिया गेट पर एक युवा निशांत सिंह की अगुवाई में ब्रह्मेश्वर मुखिया को बड़ी श्रद्धा से याद किया गया. फेसबुक और ट्विटर उनके चित्रों और नारों से पट गया. उस दिन सोशल मीडिया के रणवीरों ने फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल पिक बदल ली तो ट्विटर पर हैशटैग #BrahmeshwarTheWarrior पर सैकड़ों ट्वीट हुए. मिला-जुलाकर दृश्य ऐसा विहंगम बन पड़ा था कि लगा कि बाबा ब्रह्मेश्वर का फिर से आगमन हो गया है. 

लेकिन इन सबके बीच जब हृदय पर तब कटारी चल गयी जब पता चला कि किसी भी बड़े नेता ने बाबा ब्रह्मेश्वर को याद नहीं किया.याद तो करना दूर उन्होंने एक ट्वीट तक करना जरुरी नहीं समझा. ये राजनीतिक स्वार्थ की पराकाष्ठा थी.  इनमें जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार भी शामिल थे. उनका नमन न करना इसलिए भी ज्यादा खला क्योंकि वे उस जहानाबाद के सांसद है जो रणवीरों की हृदयस्थली रही है. दुर्भाग्यपूर्ण ये रहा कि उसके तीन बाद ही इफ्तार पार्टी में टोपी लगाये देखे गए और जॉर्ज फर्नाडीस को लेकर अपने निवास स्थल पर कार्यक्रम भी किया. इससे समाज के मनोबल पर असर पड़ा और हृदय को आघात पहुंचा कि आप वोट बैंक के खातिर इफ्तार पार्टी कर रहे हैं लेकिन अपने समाज के नायक को  याद तक नहीं कर रहे. कुछ और नहीं तो रालोसपा के दूसरे गुट के अध्यक्ष और अपने पुराने साथी उपेन्द्र कुशवाहा से ही कुछ प्रेरणा ले लेते. 

मानव संसाधन राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा बिहार का लेनिन कहे जाने वाले जगदेव प्रसाद की जयंती हर साल बड़ी ठसक से मनाते हैं. कभी नहीं चूकते. कम -से-कम इस मामले में उनसे थोड़ा सीखना चाहिए. बाकी तो आप जानते ही हैं कि जगदेव प्रसाद भूमिहार / स्वर्ण विरोधी व्यक्ति थे. हमारे नायक नहीं थे लेकिन कुशवाहा ठसक से मनाते थे और आप कुछ कहने का साहस नहीं कर पाते थे. इसी तरह आपको भी अपने नायकों का सम्मान करना चाहिए और सहजानंद सरस्वती और दिनकर जी के अलावा ब्रह्मेश्वर मुखिया का भी नाम लेना चाहिए. जहानाबाद के सांसद से भूमिहार ब्राहमण समाज इतनी तो आशा रखता है.क्या कुछ गलत कहा अरुण बाबू?

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