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मोदी की सत्ता में हिस्सेदारी के लिए जमात ए उलमा की घेराबंदी

याद है न, यूपी चुनाव के बाद मैंने कहा था अब कट्टरपंथी मुसलमान बीजेपी का रुख करेंगे। इसलिए नहीं कि उन्हें बीजेपी से कोई मोहब्बत हो गयी है बल्कि इसलिए कि जो काम विरोध करके न रुकवा सके उसे समर्थक बनकर रुकवा लें। जैसे भी हो, इस्लाम की रक्षा होनी चाहिए। अल तकिया से या फिर तलवार से। 

कल मोदी से जो मुसलमानों का प्रतिनिधिमंडल मिला है उसमें मदनी भी थे और बद्दरुद्दीन अजमल भी। जमात ए उलमा ए हिन्द भारत की सबसे बड़ी सुन्नी मुसलमानों (देओबंदी) की संस्था है। राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा सक्रिय भी यही रहते हैं। आसाम से लेकर गुजरात तक सबसे तगड़ा नेटवर्क है। यहां जो मौलवी मौलाना बैठे हैं वो सब जमात के ही लोग हैं। 

कट्टरपंथी मुसलमान सत्ता के बिना नहीं रह सकता। या तो वह सत्ता में भागीदारी करता है या फिर दावेदारी। क्योंकि उनके लिए इस्लाम का मतलब कोई मजहब नहीं है। इस्लाम है सत्ता का हथियार। पॉवर हाथ में होनी चाहिए। फिर वह चाहे जैसे हो। इसलिए लोकतंत्र में मुस्लिम वोटबैंक का खेल खेला जाता है। अब तक यह खेल दूसरे दलों के साथ खेला जाता था, अब यही खेल इस्लाम के सबसे बड़े जीवित दुश्मन मोदी के साथ शुरु हो चुका है। दोनों अपने अपने दांव चल रहे हैं। देखते हैं किसकी शह होती है और किसकी मात। 
(लेखक के एफबी वॉल से साभार)

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