Skip to main content

अनंत सिंह को बाहुबली विधायक की छवि से निकलकर अपनी राजनीति को विस्तार देना होगा

अनंत सिंह को राष्ट्रीय छवि बनानी है तो उठाना पड़ेगा ये कदम

मोकामा के विधायक अनंत सिंह बिहार सरकार द्वारा खड़े किये गए तमाम बाधाओं को पार करते हुए आखिरकार जेल से बाहर आ ही गए. लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं कि कब कौन सा केस का भूत उनकी गिरफ्तारी की शक्ल में सामने आ खड़ा हो जाए. क्योंकि ये बात किसी से छुपी नहीं कि अनंत सिंह की गिरफ्तारी के पीछे सियासी रंजिश भी थी. इस वक़्त अनंत सिंह के बाहर निकलने से वही राजनीतिक शक्तियां बेचैन महसूस कर रही होंगी. निश्चित रूप से फिर से नयी साजिश रची जा रही होगी और उस साजिश को अंजाम देने के लिए गुर्गे भी तैनात किए जा रहे होंगे. आखिर सत्ता को चुनौती देने वाले एक व्यक्ति को सरकार कैसे बर्दाश्त कर सकती है? 

इसलिए अनंत सिंह के सामने दोहरी चुनौती है. पहली चुनौती कानून की है और दूसरी चुनौती राजनीतिक है. ख़ैर कानून तो अपना काम करेगा ही. लेकिन असल चुनौती राजनीतिक है और इसकी काट भी राजनीति में ही है. अबतक अनंत सिंह जदयू की छतरी के नीचे अपनी राजनीतिक यात्रा कर रहे थे लेकिन अब निर्दलीय हैं. इन दोनों ही स्थितियों में ज़मीन-आसमान का अंतर है और इस अंतर को कम करने के लिए अनंत सिंह को अपनी राजनीतिक हस्ती को विस्तार देना होगा या फिर किसी और पार्टी का दामन थामना होगा.किसी और पार्टी का जहाँ तक दामन थामने का सवाल है तो उसमें बहुत ज्यादा कोई विकल्प नहीं. ज्यादा से ज्यादा वे भाजपा में जा सकते हैं. लेकिन आजकल भाजपा भी भूमिहार ब्राहमणों से छिटक रही है. उनका रुझान यादव वोट बैंक की तरफ है. ऐसे में अनंत सिंह के पास एकमात्र विकल्प यही है कि वे अपने दम पर न केवल खड़े हो, बल्कि उसे एक नयी दिशा भी दे. इसके लिए बाहुबल की नहीं राजनीतिक चातुर्य की जरुरत पड़ेगी. 

पूरे देश की मीडिया ने अनंत सिंह की छवि एक सनकी बाहुबली नेता की बनायी है. इसका प्रमाण नेट पर उपलब्ध ख़बरें हैं जिसे पढने के बाद नकरात्मक छवि बनती है. ऐसी स्टोरी आपको कहीं न मिलेगी जिसमें ये बताया गया हो कि अनंत सिंह टाल क्षेत्र के लोगों के मसीहा भी हैं और सिर्फ भूमिहार ब्राहमणों के वोट से नहीं जीत कर आते. अपनी इस नकरात्मक छवि को अनंत सिंह को सूझबूझ से बदलना होगा. कम-से-कम अब ऐसी कोई भी नयी बात नहीं होनी चाहिए जिससे बट्टा लगे और मीडिया व विरोधियों को हायतौबा करने का मौका मिले.दूसरी महत्वपूर्ण बात कि उन्हें अब विधायकी से आगे सांसद बनने के बारे में सोंचना चाहिए. एक बार सांसद बन गए तो राजनीतिक कद बढ़ने के साथ-साथ बहुत सारी समस्याएं खुद-ब-खुद निपट जायेगी. लेकिन इन सारी बातों का मर्म धैर्य और संतुलित व्यवहार में छिपा हुआ है जो कि जेल से निकलने के बाद वे लगातार दिखा भी रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि ऐसा आगे भी कायम रहेगा. राजनीति का बाहुबली बनने के लिए ऐसा करना जरुरी है.

Community Journalism With Courage

Comments

Popular posts from this blog

पिताजी के निधन पर गमगीन कन्हैया के चेहरे का नूर !

सहसा यकीन नहीं होता, लेकिन तस्वीर है कि यकीन करने पर मजबूर करती है. आपको जैसा कि पता ही है कि छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में आए कन्हैया के पिता का निधन हो गया था. इस दौरान उनकी तस्वीर भी न्यूज़ मीडिया में आयी थी जिसमें कि वे फूट-फूट कर रो रहे थे. समर्थक और विरोधी सबने दुःख की घड़ी में दुआ की और एक अच्छे इंसान की भी यही निशानी है कि वो ऐसे वक्त पर ऐसी ही संवेदना दिखाए.

बेगूसराय की इस भूमिपुत्री ने 18 साल की उम्र में कर दिया कमाल, पढेंगे तो इस बिटिया पर आपको भी होगा नाज!

प्रेरणादायक खबर : बेटियों पर नाज कीजिए, उन्हें यह खबर पढाईए
बेगूसराय. प्रतिभा किसी चीज की मोहताज नहीं होती. बेगूसराय के बिहटा की भूमिपुत्री प्रियंका ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. 18 साल की उम्र में प्रियंका इसरो की वैज्ञानिक बन गयी हैं. आप सोंच रहे होंगे कि वे किसी धनाढ्य और स्थापित परिवार से संबद्ध रखती हैं लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. उनके पिता राजीव कुमार सिंह रेलवे में गार्ड की नौकरी करते हैं और मां प्रतिभा कुमारी शिक्षिका हैं. वे बिहटा के एक साधारण भूमिहार ब्राहमण परिवार से ताल्लुक रखती हैं. इस मायने में उनकी सफलता उल्लेखनीय है.  पढाई-लिखाई :  1-दसवी और 12वीं : वर्ष 2006 में 'डीएवी एचएफसी' से दसवीं और वर्ष 2008 में 12वीं  2-बीटेक : नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी अगरतला  3-एमटेक : एमटेक की पढ़ाई इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गुवाहाटी से पूरा कर रही हैं  सफलताएं :  1- वर्ष 2009 में एआईईई की परीक्षा में 22419वां रैंक  2- वर्ष 2016 में गेट की परीक्षा में 1604वां रैंक  3- शोध पत्र 'वायरलेस इसीजी इन इंटरनेशनल' जर्नल ऑफ रिसर्च एंड साइंस टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग म…

सेनारी नरसंहार को देख जब भगवान भी काँप गए,17 साल से बंद है मंदिर

मंदिर भगवान का घर होता है लेकिन उस मंदिर में जाकर कोई कुकृत्य करे तो भगवान भी नाराज़ हो जाते हैं और अपने द्वार बंद कर देते हैं. 
बिहार के अरवल जिले के सेनारी गांव में 17 साल पहले ऐसा ही हुआ जब मंदिर रक्तरंजित हो गया और उस घटना को देख भगवान भी एक बार काँप गए होंगे.लेकिन प्रभु से ये मासूम जिज्ञासा भी है कि अपने सामने ऐसा अनर्थ उन्होंने होने कैसे दिया? 
सेनारी में 17 साल पहले गाँव के इसी मंदिर में चुन-चुनकर 34 भू-किसानों की हत्या एक के बाद एक कर हुई थी. ह्त्या का तरीका भी बेहद निर्मम और दिल दहलाने वाला था. 
सभी 34 लोगों की हत्या गला रेत कर गाँव के मंदिर के द्वार पर की गयी थी. तब से आज तक उस मंदिर के द्वार बंद हैं. गांव के लोगों ने इस मंदिर में पूजा पाठ करना बंद कर दिया है. 
ग्रामीणों के मुताबिक भगवान के द्वार पर लोगों की हत्या कर दी गई है. लिहाजा मंदिर में पूजा करने का क्या फायदा ? अब पिछले 17 सालों में यह मंदिर वीरान पड़ा हुआ है.