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भूमिहार ब्राह्मण समाज की दुर्गति के 10 कारण

bhumihar

भूमिहार ब्राहमण समाज सदैव वक़्त से आगे रहा है और यही इसकी समृद्धि व बल का प्रमुख कारण रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसमें गिरावट आयी है. व्यक्तिगत विकास तो हो रहा है लेकिन सामूहिक विकास नहीं हो पा रहा. आखिर क्या वजह है कि एक तरफ तो हमारे पास उदय शंकर (हेड, स्टार इंडिया),विनोद राय (अध्यक्ष,बीसीसीआई), मृत्यंजय कुमार नारायण(सचिव,यूपी सीएम), मनोज सिन्हा(केन्द्रीय मंत्री) आदि जैसे अनेकों नाम हैं लेकिन दूसरी तरफ हालात खस्ताहाल है. गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुंठा आदि से समाज का एक बड़ा वर्ग पीड़ित है और उनकी दशा पिछड़ों की तरह है. इसी पर वित्तीय सलाहकार और वरिष्ठ भूमिपुत्र श्री अशोक कुमार चौधरी अपनी बात रख रहे हैं. उन्होंने वर्तमान परिदृश्य के हिसाब से दस कारण बताये हैं जिसे यदि ठीक कर लिया जाए तो भूमिहार ब्राहमण समाज का समग्र विकास होगा. 

ashok kumar chaudhary

श्री अशोक कुमार चौधरी, वित्तीय सलाहकार

*आज भूमिहार समाज की सबसे बड़ी दुविधा,सबसे बड़ी शर्म की बात* 

 1- हिस्सों में बंटा समाज : दुनिया में सेवा ,त्याग और सदाचार का अलख जगाने वाला समाज ही हिस्सों में बंटा हुआ है। 

2- आय और धन में असमानता : 70% समाज के लोग धनी वर्ग से फिर भी समाज के 30% लोगो के पास रहने को घर नही ,घर चलाने को रोजगार नहीं । 

3- अहंकार और द्वेष : एक से एक महान दिग्गज संतो ,उदयोगपतियो,पदाधिकारीयो का सानिध्य फिर भी लोगो में द्वेष स्वार्थ और अहंकार की भावना । 

4- विवाह के तरीकों में खोट : शादियों के लिए लोग अब गुणवान लड़के या लड़किया नही बल्कि अच्छी पार्टिया खोजते है जिसका परिणाम यह है कि आज सबसे ज्यादा विवाह के पश्चात वैवाहिक संबंधों में दरार पैदा हो गयी है। 

5- दहेज़ प्रथा और व्यर्थ का दिखावा : भूमिहार ब्राह्मण समाज के सामाजिक ढांचे को दहेज़ रूपी दानव लीलने को आतुर है. ये एक बड़ी सामाजिक सच्चाई है. बेटी पढ़-लिख भी जाती है फिर भी दहेज़ तो जुगाड़ना ही पड़ता है. इसे कई जगह सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया है. फिर शादियों में होने वाले व्यर्थ के दिखावे ने भी आर्थिक रूप से समाज के बहुतेरे लोगों को कमजोर किया है. ढेरों लोगों ने ज़मीन वगैरह बेचकर इस दिखावे का निर्वाहन किया है. 

6- असहयोग और अविश्वास : समाज में ज्यादातर लोग अपने स्वधर्मी भाई को उठाने के बजाए उसे दबाने की कोशिश करते है जबकि होना यह चाहिए कि स्वधर्मी को पूर्ण सहयोग करना चाहिए । 

7- महानता का व्यर्थ प्रदर्शन : अपने कुनबे के लोगो को छोड़ के अन्य सेवा संस्थान खोलकर अन्य लोगो की सेवा करते है और खुद को महान दर्शाते है 

8- सेवा का ढिंढोरा : तीर्थ स्थलों पर धर्मशाला बनाकर कुछ समाजसेवी स्वयं उन धर्मशालाओ का शुल्क लेते है और निस्वार्थ सेवा का ढिंढोरा पीठते है । 

9- बेपरवाह समाज : भूमिहार की संख्या नित प्रतिदिन घट रही है फिर भी समाज में कोई चिंता की लकीरें नही। 

10 - सार्थक दृष्टिकोण का अभाव : इतना समृद्ध समाज होने के बाद भी समाज की कोई बैंक या कोई इसी तरह की योजना नही जिससे समाज के युवाओं को रोजगार मिले,घर या जरुरत के लिए पैसा लोन के रूप में मिल सके ।। 

आओ मिलकर सोचे और बनाएँ अपने समाज को भी सुन्दर स्वच्छ समृद्ध और प्रगतिशील सभी समाज सेवी चिंतन करे, हमारे युवाओं को रोजगार दे 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 भाववश कुछ गलत लिखा हो तो जय परशुराम .

 🙏🏻 श्री अशोक कुमार चौधरी, वित्तीय सलाहकार* 🙏🏻

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ज़मीन से ज़मीन की बात 

भूमंत्र

Comments

Shwetank sharma said…
अच्छी पहल है।विकास का एक मात्र मार्ग होता है अपनी कामजोरियो पर काम करना और आपके द्वारा ये सार्थक कार्य हो रहा है।सराहनीय!

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