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परशुराम जयंती आते ही पगला जाते हैं दिलीप मंडल !

parshuram jaynti

भगवान परशुराम में जाति ढूंढते दिलीप मंडल 

भगवान परशुराम का जन्मोत्सव हरेक बार हर्षो-उल्लास और भक्तिभाव से मनाया जाता है. सभी जातियों के लोग इसमें भाग लेते हैं. भूमिहार ब्राहमणों के तो वे इष्टदेव ही हैं सो उनका जन्मोत्सव पूरे समाज के लिए ख़ास होता है. प्रभु की कृपा से परशुराम जी के जन्मोत्सव के झांकी की शोभा हरेक साल बढती ही जा रही है. इससे जातिवादी अवसाद से ग्रसित कई तथाकथित दलित चिंतक बड़े परेशान हैं. परशुराम जयंती आते ही वे हायपर एक्टिव हो जाते हैं और अनाप-शनाप लिखना शुरू कर देते हैं. ऐसे ही एक कुंठित किस्म के जातिवादी प्राणी हैं दिलीप मंडल जिनका दिन-रात काम है सवर्णों का गरियाना. दरअसल यही उनकी रोजी-रोटी भी है. रायता फैलाकर सोने की कटोरी में घी पीना! 

परशुराम जयंती पर दिलीप मंडल की कै-दस्त 

दिलीप मंडल

 

बहरहाल अबकी बार भी भगवान परशुराम का जन्मोत्सव आते ही मंडल जी को कै-दस्त होने लगा. फिर क्या था जमालघोटा खाकर फेसबुक पर लगातार दस्त करने लगे. मंडल साहब से कुछ और नहीं बन पड़ा तो यही लिख दिया कि, “ब्राह्मण लोग इस बार ज़बर्दस्त आइडेंटिटी पॉलिटिक्स कर रहे हैं। परशुराम की तस्वीरों से फ़ेसबुक ही नहीं, शहर भी भरे पड़े हैं। आइडेंटिटी पॉलिटिक्स से सर्वहारा की एकता कमज़ोर होती है।“ 

लेकिन बात फिर भी नहीं बनी तो मंडल जी ने अपने कमंडल से फूट डालो और शासन करने वाली नीति अपनाई और ब्राह्मणों व क्षत्रियों के बीच वैमनस्य पैदा करने की नीयत से लिखा – “योगी जी और राजनाथ सिंह ने परशुराम जयंती की बधाई दी या नहीं?” 

मंडल को भगवान परशुराम हिंसक लगते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि दिलीप मंडल ने परशुराम जयंती पर पहली बार जहर उगला है. वर्ष 2015 में भी जहर उगलते हुए उन्होंने लिखा था – “किसी समुदाय को अगर परशुराम और बरमेश्वर मुखिया जैसे हिंसक और अन्यायपूर्ण प्रतीकों में हीरो नज़र आ रहा है और सहजानंद सरस्वती जैसे लोग आँखों से ओझल हैं, तो इसका एक ही मतलब है कि वह समुदाय गहरे असुरक्षा बोध में जी रहा है। नरसंहारों के सरगना रणवीर सेना के बरमेश्वर मुखिया को रिजेक्ट करो।” 

 भूमंत्र का जवाब : 

कुंठा से ग्रसित हे दलित श्रेष्ठ दिलीप मंडल, जातिवादी आँगन में किरदारों की कमी पड़ गयी जो अब भगवान को जातियों में बांटने की कवायद शुरू कर दी. ख़ैर शुरू कर ही दी है तो सुनो. भगवान परशुराम विद्या,बुद्धि और बल के प्रतीक हैं.उनका शस्त्र निर्बलों की रक्षा और अन्याय के खिलाफ उठता है.वे याचना नहीं रण करते हैं, इसलिए अयाचक ब्राह्मणों/ 'भूमिहार ब्राह्मणों' के आराध्यदेव हैं. हर जाति को अपना नायक चुनने की आजादी होती है. दूसरे के जातिवादी चश्मे से कोई समुदाय अपना नायक नहीं चुनता. हमारे नायक तुम्हे खलनायक लगते हैं तो लगता रहे. हमें क्या फर्क पड़ता है. अपना मवाद निकालकर खुद ही चाटते रहिए. भगवान परशुराम और बाबा ब्रहमेश्वर को तुम्हारे प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं.अपना प्रमाणपत्र अपने जैसों के लिए ही संभाल कर रखना, आत्मा की अर्थी पर चढाने के काम आएगा. स्वाहा. 

फिर रिजेक्टेड लोग दूसरों को रिजेक्ट करने की बात नहीं करते. वैसे असुरक्षा बोध में तो आप भी जी रहे हैं मंडल जी. भगवान परशुराम आपका भला करे और बाबा ब्रहमेश्वर से कभी सामना न हो. फेसबुक पर बैठकर भाषणबाजी आसान है. कभी खुले मैदान में आकर काम कीजिये. भगवान परशुराम की कसम पसीना निकल जाएगा और होश फाख्ता हो जायेंगे. ये लीजिये लाल रूमाल!!! पसीना पोछ लीजिये. 

दूसरी बात भगवान परशुराम ने क्षत्रियों का नहीं बल्कि अन्यायी राजाओं का वध किया था. इसलिए उन्हें क्षत्रिय विरोधी मानना न्यायसंगत नहीं. यही वजह है कि उस वक़्त के तमाम न्यायप्रिय क्षत्रिय राजा उनका सम्मान करते थे. वे जिस सभा में जाते थे तो उनके स्वागत के लिए राजा सिंहासन से उठ खड़े होते थे. ऐसा सिर्फ भयवश नहीं होता था।।सम्मान का भाव भी होता था।।इसलिए ब्राह्मणों को क्षत्रियों से लड़ाने की आपकी साजिश बेकार है. और हाँ राजनाथ सिंह ने परशुराम जयंती की बधाई दी है.आपको बुरा लगा. ओ ले ले .. लेमनचूस खाइए. भगवान परशुराम को समझना आप जैसों के बस की बात नहीं.

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ज़मीन से ज़मीन की बात 

भूमंत्र

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