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लालू यादव के चक्रव्यूह में नीतिश कुमार की राजनीति!

लालू-नीतिश गठबंधन में नीतिश कुमार की राजनीति का क्या होगा?


अभय सिंह- 

कुछ वर्ष पहले नरेंद्र मोदी के विरोध में नीतीश कुमार ने राजग से बरसों पुराना नाता तोड़ लिया।बिहार में सहयोगी बीजेपी को अपमानित करके सत्ता से बाहर कर दिया ।इतना ही नहीं उन्होंने मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और महादलित जीतनराम मांझी को सत्ता सौंप कर खुद बिहार में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाने में जुट गए। इतने घटनाक्रमो के बाद नीतीश का आज फिर बीजेपी के करीब जाना सभी को हैरत में डाल रहा है।नोटबंदी ,सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन करना , बीजेपी नेताओं से नजदीकी बढ़ाना या कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह की दिलखोलकर प्रशंशा करना ऐसे अनेकों उदाहरण है जो नितीश के मोदी के प्रति बढते झुकाव को प्रदर्शित करता है। 

लेकिन अगर गहराई से पड़ताल करे तो माजरा कुछ और ही समझ में आएगा। नितीश बिहार के सीएम भले ही बन गए हों लेकिन उन्होंने अपनी कीमत पर लालू और कांग्रेस को कई गुना ताकतवर बना दिया है।2010 में 115 विधायको वाली जदयू आज महज 71 सीटों में सीमित रह गयी और कई सालों से हाशिये पर पड़े लालू और कॉंग्रेस ने 108(81+27) सीटे जीतकर सत्ता में सबसे बड़ी साझेदार बन गयी।नीतीश को सीएम बनाने की एवज में लालू ने कई अहम विभाग हथिया लिये ।लालू और कांग्रेस के मंत्रियो पर नीतीश का नियंत्रण ना के बराबर है।और लालू,रघुवंश के नीतीश पर लगातार हमले गठबंधन की नीव को लगातार कमजोर कर रहे है।अभी हाल ही में राबड़ी देवी द्वारा नीतीश को रिटायर होने की सलाह और अपने बेटे तेजस्वी को सीएम बनाने का बयान इस खाई को और गहरा कर रहा है। 

शराबबंदी के निर्णय पर अंदरखाने लालू,कांग्रेस का भारी विरोध नीतीश को असहज कर रहा है।लालू लगातार शासन व्यवस्था पर नीतीश पर हावी होने का प्रयास कर रहे है और उन्हें ये बार बार यह जताने की कोशिश करते हैं की महागठबंधन में लालू सबसे बड़े दल के नेता है जिन्होंने अधिक विधायक होने के बाद भी नीतीश को सीएम बनाया है। आज नीतीश को पुराने साथी सुशील मोदी की याद आ रही है जो डिप्टी सीएम होने के बावजूद एक सेवक की तरह उनके हर निर्णय को आँख मूदकर स्वीकार कर लेते थे। आज अगर नीतीश फिर से राजग में लौटते है तो उनका राजनीतिक पतन होना तय है क्योंकि मोदी- शाह उन्हें अपनी शर्तों पर चलाने का प्रयास करेंगे।ना ही उन्हें वो कद मिलेगा जो अटल,आडवाणी के दौर में मिलता था साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री बनने की इच्छा को भी तिलांजलि देनी होगी ।कुल मिलाकर नीतीश के सामने आगे कुँआ पीछे खाई की स्थिति है। बेहतर तो यही होगा की वो बीजेपी से नजदीकी बढ़ाने की बजाय लालू को किसी और तरीके से काबू करने का प्रयास करे।

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