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क्षेत्रीय नेताओं पर मेहरबान मोदी

modi

(अनंत विजय)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों के दिन एक न्यूज चौनल पर चर्चा के दौरान बीजेपी के एक उत्साही नेता ने लगभग नारेबाजी की शक्ल में कहा कि यह बीजेपी से ज्यादा नरेंद्र मोदी की जीत है। बहुत विनम्रता से उन्हें मैंने नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनने के पहले 20 मई 2014 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में दिया भाषण याद दिलाया।

उस भाषण में उन्होंने भावुक होकर कहा था कि पार्टी उसके कार्यकर्ता के लिए मां समान होती है और मां पर कोई कृपा नहीं करता है बल्कि सेवा करता है। कहना ना होगा कि मोदी अपने इस वाक्य से पार्टी और संगठन की अहमियत बता रहे थे।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने पार्टी ढांचे की अहमियत को दरकिनार नहीं किया। उन्होंने लगभग तीन वर्षों के अपने कार्यकाल में बीजेपी को सांगठनिक रूप से मजबूत करने का काम किया है। जिन राज्यों में बीजेपी को असेंबली चुनावों में जीत मिली, वहां स्थानीय नेतृत्व को उभारने और मजबूत करने की योजना पर गंभीरता से काम हुआ।

बेदाग छवि पर जोर
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को सूबे की कमान सौंपकर एक बार फिर प्रधानमंत्री ने अपनी इस कार्ययोजना को परवान चढाया। उन्होंने योगी को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी को आडवाणी-वाजपेयी युग से आगे ले जाने और युवा नेतृत्व देने का साहस दिखाया। ना सिर्फ योगी को बल्कि अपने विश्वासपात्र रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को भी गोवा भेजकर वहां पार्टी की स्थिति मजबूत करने का दांव चला। पर्रिकर के दिल्ली आने से पार्टी गोवा में बिखर गई थी।

इसके पहले भी उन्होंने महाराष्ट्र में ब्राह्मण देवेन्द्र फडणवीस को, झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास को, हरियाणा में गैर-जाट मनोहर लाल खट्टर को और असम में युवा नेता सर्वानंद सोनोवाल को सूबे की कमान सौंपी थी। गुजरात में तमाम अटकलों के बावजूद विजय रूपानी को कमान मिली थी। विधानसभा चुनावों में जीत के बाद तो अटकलें ये भी लग रही हैं कि शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे को दिल्ली लाकर वहां नए नेतृत्व के हाथों में सत्ता दी जाएगी। अगर ऐसा होता है इसे ऐंटी इंकंबेंसी को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जाएगा। दरअसल मोदी उन लोगों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं जिनकी छवि बेदाग है और जो दबाव में नहीं आते।

देवेन्द्र फडणवीस को ही लें तो वह शिवसेना के प्रेशर में जरा भी नहीं आते और पार्टी को लगातार मजबूत भी करते चल रहे हैं। ऐसी ही छवि योगी आदित्यनाथ की भी है। इसके साथ ही मोदी जिनको चुनते हैं, उनके आसपास एक कवच तैयार कर देते हैं। जैसे, योगी के मुख्यमंत्री बनने के फौरन बाद सूबे के सभी सांसदों को बुलाकर संदेश दे दिया कि वे ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री के पास सिफारिश ना करें। इस तरह से वह स्थानीय या क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करते हैं। राजनीतिक तौर पर इसके कई फायदे हैं। एक तो संगठन मजबूत हो रहा है, दूसरे अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाकर नरेंद्र मोदी अपनी स्थिति को भी मजबूत कर रहे हैं। इस वक्त पार्टी में उनको कोई चुनौती देने वाला नहीं है, लेकिन वह भविष्य के मद्देनजर अपनी रणनीति तय करते चल रहे हैं।
अब बीजेपी की तुलना में अन्य दलों में देखें तो इसका साफ अभाव दिखता है। कांग्रेस ने तो वर्षों तक स्थानीय नेतृत्व को कमजोर करने का ही काम किया। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक ने किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को मजबूत नहीं होने दिया। इन दो नेताओं के दौर में शायद ही कोई ऐसा सीएम होगा, जिसने पद पर अपना कार्यकाल पूरा किया हो। कांग्रेस में इंदिरा गांधी के दौर में किचन कैबिनेट और राजीव गांधी के दौर में कोटरी हुआ करती थी, जिनमें तमाम वे नेता होते थे जो गणेश परिक्रमा में यकीन रखते थे। लंबे समय तक चली इस कोटरी की पॉलिटिक्स ने कांग्रेस को पंगु कर दिया। सांगठनिक क्षमताओं की बजाय उन नेताओं को तरजीह दी जाने लगी जो नेता व्यक्ति पूजा में प्रवीण थे।

यही वह दौर था जब भारत को राजवंशीय लोकतंत्र कहा जाने लगा था क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी एक परिवार के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। इंदिरा गांधी ने जिस दरबारी संस्कृति को बढ़ावा दिया था, उसको संजय-राजीव-सोनिया ने आगे बढ़ाया। राहुल गांधी ने जरूर शुरुआत में संगठन चुनाव आदि की पहल की थी लेकिन वह भी उसको आगे नहीं बढ़ा पाए और दरबारियों ने उनको अपने चंगुल में ले लिया। कांग्रेस की इस राजवंशीय संस्कृति का असर अन्य पार्टियों पर भी पड़ा, चाहे वह डीएमके हो, एआईएडीएमके हो, नैशनल कॉन्फ्रेंस हो, जेडीएस हो, समाजवादी पार्टी हो।

समाजवादी पार्टी, नैशनल कॉन्फ्रेंस और डीएमके जैसी कुछ पार्टियों के नेताओं ने अपने बेटों को पार्टी सौंप दी, जबकि मायावती, ममता और जयललिता ने दूसरी पंक्ति के नेता तैयार नहीं किए। नीतीश कुमार तक ने इस मसले पर कुछ खास नहीं किया। दरअसल ऐसे नेताओं को लगता है कि अगर कोई मजबूत नेता उभर गया तो उनकी कुर्सी को खतरा हो सकता है। इस मनोविज्ञान के कारण ही प्रायः किसी कमजोर नेता को आगे बढ़ाया जाता है, या फिर एक साथ कई छुटभैये लीडर खड़े किए जाते हैं जो आपस में लड़ते रहते हैं।

जमीनी बदलाव जरूरी
कांग्रेस को अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में मुकाबले में रहना है तो उसको अपने क्षेत्रीय नेताओं को अहमियत देनी होगी। पार्टी की अभी जो हालत है, उसे देखते हुए यह संभव नहीं लगता कि वह 2019 के लोकसभा चुनाव तक सांगठनिक रूप से मजबूत होकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे सकेगी। कांग्रेस के नेता भले ही पार्टी में बदलाव की बात करें लेकिन ये बदलाव जमीनी होंगे तभी लाभ हो पाएगा।

(साई फीचर्स)

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