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बाबू लंगट सिंह भूमिहार ब्राहमण जरुर थे लेकिन उन्हें जाति के चश्मे से देखना उचित नहीं !

महान शिक्षाविद बाबू लंगट सिंह को जाति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. वे अपने समय के आगे की सोंचते थे और उसी के तहत उन्होंने जो कार्य किया, वैसा बाद में सरकार भी नहीं कर पायी. बाबू लंगट सिंह स्मृति समारोह में कल यही बात उभर कर सामने आयी. पढ़िए पूरी रिपोर्ट -
langat babu smriti samaroh 2017

दिल्ली. शिक्षा के क्षेत्र में अलख जलाने वाले बाबू लंगट सिंह विजनरी शिक्षाविद थे, जिसका साक्षात प्रमाण मुजफ्फरपुर का ऐतिहासिक लंगट सिंह कॉलेज (एल।एस।कॉलेज) है। ये उनकी विजनरी का ही कमाल है कि उन्होंने अपने समय में उत्तर बिहार में शिक्षा के सबसे बड़े मंदिर के रूप में एल.एस.कॉलेज की स्थापना की। बाबू लंगट सिंह स्मृति समारोह में समाज में शिक्षा की भूमिका पर वक्ता के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़24 के हेड (डिजिटल) सतीश के.सिंह ने ये बाते कहीं। रविवार को जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में लंगट बाबू के कार्य को वर्तमान शिक्षा परिदृश्य से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे स्वपनदर्शा थे जो समय से आगे की सोंचते थे और उन्होंने एल.एस.कॉलेज की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में जो काम किया,वैसा बाद में सरकार भी नहीं कर पायी। वही सुलभ इंटरनेशनल के सह-संस्थापक डॉ। बिंदेश्वर पाठक ने भी लंगट बाबू को महान शिक्षाविद करार देते हुए कहा कि सदियों में ऐसी विभूतियाँ समाज में जन्म लेते हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने अपनी बात रखी। इस मौके पर उन्होंने सुलभ इंटरनेशनल की कहानी भी संक्षिप्त शब्दों में बयान की। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक संगीत रागी ने लंगट बाबू के काम को मील का पत्थर मानते हुए विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता का मुद्दा उठाया। उन्होंने कि शिक्षा सरकारी नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए। वही दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कॉलेज के प्राचार्य डॉ। मनोज सिन्हा ने कहा कि लंगट बाबू ने शिक्षा के क्षेत्र में समाज को बहुत कुछ दिया है और ऐसी महान विभूतियों को समाज को भी याद रखना चाहिए। इस दिशा में ऐसे कार्यक्रमों का होते रहना बेहद जरुरी है। 

लेकिन सभागार का माहौल तब गरमा गया जब लंगट सिंह पर बात करते हुए समाजसेवी शिव कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि नीतीश जी ने लंगट सिंह कॉलेज को लेकर बड़े-बड़े वायदे किये लेकिन आजतक कुछ नहीं किया। बदहाली का आलम ये है कि 63 प्रोफ़ेसर की जगह अब सिर्फ 8 प्रोफेसर रह गए हैं। अतः इसके जीर्णोद्धार के लिए अब उनकी संतानों को आगे आना पड़ेगा। इस मौके पर पूर्व आयकर अधिकारी अजय कुमार और कमल संदेश पत्रिका के कार्यकारी संपादक शिवशक्ति नाथ बक्शी ने भी अपने विचार रखे। सबकी एक राय थी कि बाबू लंगट सिंह को जाति के चश्मे से देखना अन्यायपूर्ण होगा।उन्होंने लंगट सिंह कॉलेज को स्थापित करके शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा कार्य किया जिसका लाभ समाज के सभी तबके और जाति को हुआ। 

कार्यक्रम के उद्देश्य पर पुष्कर पुष्प ने प्रकाश डाला जबकि संचालन सूर्यभान राय ने किया. कार्यक्रम के आयोजक ब्रजेश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन दिया. इस मौके पर सभी गणमान्य वक्ताओं को बाबू लंगट सिंह स्मृति चिन्ह भी भेंट किया गया. समारोह में बाबू लंगट सिंह के पोते ‘कुणाल सिंह’ भी मौजूद थे. उनके अलावा नवीन सिंह, रोहन राय, सुबोध मिश्रा, मनीष ठाकुर, केशव कुमार, शंकर, राहुल श्रीवास्तव,ओम प्रकाश, राम एन.कुमार, जयराम विप्लव, आलोक सिंह,विजय आदि बुद्धिजीवी,पत्रकार,शिक्षाविद,छात्र और आमजन बड़ी संख्या में कार्यक्रम में उपस्थित थे.

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