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बाबू लंगट सिंह जैसी हस्तियाँ दुबारा क्यों नहीं पैदा होती?

जेएनयू में लंगट सिंह को याद करने के मायने, शिक्षा जब धंधा बन गया है तब लंगट सिंह को क्यों याद किया जाए?
manish thakur

मनीष ठाकुर,टीवी पत्रकार - 


बिहारियों का सबसे बड़ा दर्द है कि शिक्षा के अलावा उसके पास जीवित रहने के लिए मजदूरी के अलावा कोई खुराक ही नहीं। एक बिहारी की पहचान देश में शिक्षा की ताकत से भारत के तमाम प्रभावशाली पद के अलावा तकनीक पर काबिज होने को है लेकिन बिहार की पहचान अशिक्षित और बदहाल प्रांत के रूप में है। 

उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर में जब भारत आजादी की लड़ाई को लेकर गंभीर नहीं हुआ था तब बिहार का एक कम-पढ़ा लिखा लंगड़ा मजदूर बड़ा ठेकेदार बन गया। रेलवे में ठेका से खूब पैसा कमाया फिर जिंदगी की पूरी पूंजी एक कॉलेज के निर्माण में लगा दिया। तब जब काशी से कोलकोता गंगा के उत्तर में कोई कॉलेज नहीं था। यही बिहार का चरित्र है आज भी वहां शिक्षा ही जीविकोपार्जन का जरिया है। यदि ऐसा है तो क्यों बिहारी बच्चे शिक्षा हासिल करने के लिए बिहार से बाहर जाने को मजबूर है?बिहार की पूंजी का बड़ा हिस्सा बाहर जाता है। क्यों कोई लंगट सिंह दुबारा पैदा नही हुआ। सबसे अहम इस लंगट को जनता कौन है? क्यों जानना जरूरी है अपने प्रतीकों को VOICE of Muzaffarpur ने इसे ही गंभीरता से लेते हुए इसे देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जे एन यू में लंगट सिंह को याद किया। 

कई शिक्षाविदों के साथ समाज में बड़ी भूमिका देने वाले सुलभ पुरुष बिंदेश्वर पाठक भी थे। कोई बात नहीं कि  पाठक जी ने इस मंच  को भी सुलभ की उपलब्धि गिना दिया। आखिर है तो उनके पास कोई बड़ी उपलब्धि जिसका अनुसरण किया जाय। लेकिन यहाँ हमने एक मुदा उठाया कि  शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार पर क्यों नहीं होनी चाहिए? हर बच्चे को उसके स्कूल में एन सी आर टी की किताब क्यों न पढ़ाया जाय?क्यों न शिक्षा को दुकान बनाने से अब रोका जाय। मोदी के योगी ने यह वायदा किया पर अमल कब होगा। अब यह मुहिम  जारी रहेगा।मजदूर से बना ठेकेदार ने धंधा के लिए कॉलेज नहीं खोला था। इसी लिए शिक्षा को धधा बनाए के युग में लंगट सिंह याद किये जा रहे है। ऊर्जा बनाये रखने के लिए याद किये जायेंगे। (लेखक के सोशल मीडिया प्रोफाइल से साभार)

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